Saturday, February 19, 2022

 

भरतपुर में 12—13 मार्च को होगा तेल उद्यमियों का महाकुम्भ
खाद्य तेल सैक्टर के हितों पर रक्षा पर होगी चर्चा
इस वर्ष देश में सरसों की रिकार्ड बुआई के बीच ​देश में रिकार्ड उत्पादन की संभावनाओं के बीच आगामी 12—13 मार्च को 42वां अ​खिल भारतीय रबी तिलहन सेमिनार भरतपुर में होने जा रहा है।
यूं तो वर्ष में हर वर्ष खाद्य तेल उद्यमियों के दो सम्मेलन होते हैं लेकिन इस वर्ष 42वां अखिल भारतीय रबी तिलहन सेमिमार ऐसे समय में हो रहा है जब विश्व बाजार में खाद्य तेलों के भाव रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं और इसका सीधा असर भारतीय खाद्य तेल बाजार पर पड़ा है। सरकार खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अनेक कदम उठा चुकी है लेकिन भाव में वांछित गिरावट नहीं आ सकी है।
वास्तव में अब खाद्य तेल उद्योगव्यापार परेशानी में है। भाव बढ़ोतरी का कारण विश्व बाजार में तेजी है लेकिन सरकार व्यापारियों को कटघरे में खड़ा कर रही है।
सरकार के बारबार आयात ड्यूटी में कमी करने या अचानक स्टाक लिमिट लगाने या आयल काम्पलैक्स में वायदा कारोबार रोकने से व्यापारी और उद्योगपति परेशानी अनुभव कर रहा है क्योंकि वह अनिश्चितता की स्थिति में कोई कारोबार की कोई योजना नहीं बना पा रहा है।
मस्टर्ड आयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन यानि मोपा के चेयरमैन श्री बाबू लाल डाटा का कहना है कि इस सेमिनार का उद्देश्य खाद्य तेल सैक्टर के हितों की रक्षा के साथ ही इस उद्योग के सामने आ रही समस्याओं के समाधान, उद्यमियों में नई त​कनीक के बारे में जागरुकता पैदा करना और देश इस सैक्टर के विकास को बढ़ावा देना है।
श्री डाटा का कहना है कि इस समय सरकारी नीतियों के कारण तिलहन उत्पादक किसान, खाद्य तेल उद्योग जिसमें प्रोसेसर्स, आयल मिलर्स भी शामिल हैं,परेशानी में है।
सेमिनार का उद्देश्य सरकार को इस बारे में अवगत कराना और सुझाव देना भी है।
उल्लेखनीय है कि भारत विश्व में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक देश है क्योंकि तिलहनों का उत्पादन खाद्य तेलों की खपत की तुलना में कम है।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशसन के प्रेजीडेंट श्री के.के. अग्रवाल का कहना है कि इस सेमिनार में देश में खाद्य तेलों के उत्पादन व उपलब्धता के बारे में भी चर्चा की जाएगी और मार्केटिंग रणनीति आदि के बारे में उद्योग को जागरुक किया जाएगा।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशन के सचिव श्री राकेश बासल का कहना है कि
सेमिनार में खाद्य तेलों की गुणवत्ता के बारे में विचारविमर्श करने के साथ ही उपभोक्ता को उच्च क्वालिटी का तेल उपलब्ध कराने पर चर्चा की जाएगी।
रबी सेमिनार कमेटी के संयोजक श्री राधेश्याम गोयल का कहना है कि इस सेमिनार में वैज्ञानिकों, तकनीकविदों तथा ते उद्योग एवं व्यापार तथा किसानों को भी आमंत्रित किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि सरसों रबी की प्रमुख तिलहन फसल है और इसमें तेल औसत मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होने के कारण देश में स्वदेशी तेलों की उपलब्धता बढ़ाने और आयात में कमी करने की क्षमता भी है।
सरसों का उत्पादन बढ़ाने की क्षमता भी व्यापक है। व्यापारियों का कहना है कि देश में सरसों का उत्पादन बढ़ाकर जल्दी ही 200 लाख टन तक किया जा सकता है लेकिन इसके लिए सरकार की अनुकूल नीतियों का होना जरुरी है।  

Friday, February 18, 2022

 मध्य प्रदेश में नई गेहूं की आवक आरंभ

सरकार द्वारा रिकार्ड उत्पादन के अनुमान

जानकार व्यापारियों का कहना है कि इस वर्ष देश में गेहूं की आवक सामान्य समय से जल्दी आरंभ हो गई और अभी नमी भी अधिक है।

जानकारों के अनुसार नई गेहूं का आरंभ फिलहाल मध्य प्रदेश की इंदौर मंडी से हुआ है और जल्दी ही मध्य भारत की अन्य मंडियों गुजरात आदि में भी आवक आरंभ हो जाएगी।

व्यापारियों के अनुसार इंदौर मंडी में लगभग 1,000 बोरी की आवक हुई है और 12-13 प्रतिशत नमी वाली गेहूं के सौदे लगभग 2,300 रुपए प्रति क्विंटल पर होते सुने गए। गत वर्ष नई गेहूं आरंभ में 2,200 रुपए बिकी थी।

व्यापारियों का कहना है कि इस समय गेहूं के भाव सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी से अधिक है। सरकार ने एमएसपी 2,015 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

नई गेहूं में नमी की मात्रा 12-13 प्रतिशत तक बताई जाती है जबकि आमतौर पर नमी 11-12 प्रतिशत होती है।

जानकारों का कहना है कि मार्च के मध्य तक इंदौर मंडी में गेहूं की आवक बढ़कर 20,000 बोरी दैनिक का स्तर पार कर सकती है।

जानकारों का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश सरकार मार्च में एमएसपी पर गेहूं की खरीद आरंभ कर देती है तो बाजार में अधिक मंदे की संभावना नजर नहीं आ रही है।

व्यापारियों के अनुसार मध्य प्रदेश के बाद जल्दी ही राजस्थान के कोटा संभाग में आवक आरंभ होने की संभावना है।

बुआई कम लेकिन

इसी बीच, देश में चालू सीजन के दौरान गेहूं की बुआई गत वर्ष की तुलना में कुछ कम हुई है क्योंकि अनेक स्थानों पर किसानों ने इसके स्थान पर सरसों की बुआई की है क्योंकि इस तिलहन फसल के भाव काफी आकर्षक रहे हैं।

सरकार ने हाल ही में जारी दूसरे अग्रिम अनुमानों में 2021-22 (जुलाई-जून) में गेहूं का उत्पादन 1,113 लाख टन होने के आशा व्यक्त की है जो एक रिकार्ड होगा।

गत वर्ष देश में 1,096 लाख टन का उत्पादन हुआ था।

बहरहाल, व्यापारियों का कहना कि उत्पादन सरकारी अनुमानों से कम हो सकता है।


Saturday, February 5, 2022

 खाद्य तेलों के बढ़ते भाव आखिर सरकार चाहती क्या है?


देश में खाद्य तेलों के बढ़ते भाव को काबू करने के लिए सरकार ने खाद्य तेलों और तिलहनों के स्टाक पर अब स्टाक सीमा आगामी 30 जून तक बढ़ा ही है।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने गत अक्टूबर में खाद्य तेलों व तिलहनों पर 31 मार्च तक स्टाक सी​मा लगाई थी और इसकी ​जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी थी।

उस समय केवल 6 राज्यों उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और बिहार ने ही इसे लागू किया था और स्टाक की सीमा भी हर राज्य ने अपनी खपत या उत्पादन को देखते हुए तय की थी।

बहरहाल, अब सरकार ने स्टाक सीमा लागू करने के काम को अपने हाथ में लिया है और एक अधिसूचना जारी करके स्टाक सीमा की मात्रा भी तय कर दी है।

बढ़ते भाव बेबस व्यापारी

उल्लेखनीय है कि भारत सहित विश्व भर में खाद्य तेलों के भाव में गत लगभग एक वर्ष से तेजी आ रही है और गत वर्ष अगस्त सितम्बर में विश्व में कई वर्ष के रिेकार्ड पर पहुंच गए थे और तेजी का प्रमुख कारण विभिन्न कारणो से अमेरिका में सोयाबीन का उत्पादन, मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम आयल का उत्पादन, कनाडा और यूरो पर कनोला—रेपसीड का उत्पादन तथा यूक्रेन आदि में सनफ्लावर सीड के उत्पादन कम होना रहा।

व्यापारी लाचार

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश में खाद्य तिलहनों—तेलों का उत्पादन इनकी खपत की तुलना में कम है और अपनी खपत के एक बड़े भाग को आयात द्वारा पूरा किया जाता है। यही नहीं भारत से सबसे अधिक विदेशी मु्द्रा कच्चे तेल के बाद खाद्य तेलों के आयात पर ही खर्च होती है।

देश में खाद्य तेलों के भाव विदेशी बाजार पर निर्भर हैं और जब वहां पर तेजी आई तो इसका असर भारतीय बाजारों पर आना भी स्वाभाविक था।

सारे तीर चलाए

सरकार ने खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अपने तरकश में रखे सारे तीर चलाए लेकिन भाव तब ही कम हुए जब विश्व बाजार में घटे।

सरकार ने पाम आयल के आयात पर दो बार ड्यूटी कम की लेकिन इसका लाभ भारतीय उपभोक्ता को नहीं मिला क्योंकि इंडोनेशिया और मलेशिया के निर्यातकों ने भाव बढ़ा दिए। पाम आयल के कुल कारोबार में दोनों देशों का पूरी तरह एकाधिकार है। इसके साथ ही वहां पर उत्पादन भी कम था।

सरकार ने सोया और सन आयल के भाव पर ड्यूटी कम कर दी लेकिन रुपया सस्ता होने और विश्वव बाजार में भाव तेज होने से इसका असर भी कोई खास नहीं हुआ। 

सरकार ने व्यापारियों पर स्टाक सीमा भी थोपी लेकिन इसका भी वांछित असर नहीं हुआ।

गिरावट आई

हां! खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आई लेकिन तब जब विश्व बाजार में गिरावट आई। ब्राजील में सोयाबीन की रिकार्ड फसल व इंडोनेशिया तथा मलेशिया में 2022 में पाम आयल में उत्पादन में सुधार के अनुमानों से भाव में गिरावट आई लेकिन यह अधिक समय तक नहीं टिक पाई क्योंकि ब्राजील ने मौसम ने धोखा दिया और वहां पर उत्पादन अब गत वर्ष से कम होने की बात कही जा रही है। इससे भाव में फिर तेजी आने लगी है।

पाम आयल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश घरेलू बाजार में पाम आयल के बढ़ते भाव से परेशान है और उसने वहां से आयात पर अंकुश लगा दिया है।

वहां से सप्लाई कम होने से मलेशिया में पाम आयल के भाव 5,700 रिंंगित के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए।

अब क्या होगा

खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आने की संभावना अब फिर दूर होती जा रही है। सरकार ने सभी उपाय कर लिए हैं। हाल के स्टाक सीमा लागू करने से भी भाव में गिरावट की संभावना सीमित ही है।

अब भाव में तब ही गिरावट आ सकती है जब​ सरकार आयात को पूरी तरह शुल्क मुक्त कर दे लेकिन यह देश के किसानों और तेल उद्योग—व्यापार के लिए घातक होगा।

अब सरसों की फसल सिर पर है। इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। ऐसे में स्टाक सीमा लागू करने से किसानों को उचित भाव नहीं मिल पांएगे तो सरकार का आत्मनिर्भर भारत का मिशन पूरा नहीं हो पाएगा।

देखना है कि अब सरकार कौन सा तीर चलाती है।

  खाद्य तेलों में तेजी का दौर सीपीओ 7.25 प्रश, सोया आयल 5 प्रश बढ़ा ब्राजील, अर्जन्टीना में सोया में  देरी गत सप्ताह विश्व बाजार में खाद्य त...