Monday, November 4, 2024

 खाद्य तेलों में तेजी का दौर

सीपीओ 7.25 प्रश, सोया आयल 5 प्रश बढ़ा

ब्राजील, अर्जन्टीना में सोया में  देरी

गत सप्ताह विश्व बाजार में खाद्य तेलों में तेजी का दौर रहा। निर्यात अधिक होने से जहां मलेशिया में सीपीओ के भाव में लगातार दूसरे सप्ताह 7.25 प्रतिशत का उछाल आया वहीं सीबोट में सोया आयल 4.87 प्रतिशत बढ़ गया। यूक्रेन में सन आयल में भी तेेजी रही।

मलेशिया में  भाव 4,879 रिंगित का रिकार्ड स्तर छू गया जो जून 2022 के बाद सबसे ऊंचा भाव है।

जानकारों का कहना है कि मलेशिया में तेजी का कारण वहां से अक्टूबर के दौरान निर्यात में भारी वृद्धि है।

व्यापारियों के अनुसार विश्व बाजार में कच्चे तेल के भाव में वृद्वि का असर भी सीपीओ पर तेजी का पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त मलेशिया और इंडोनेशिया में  पाम आयल के उत्पादन में गिरावट की आशंका है।  इंडोनेशिया से निर्यात पर अधिक टैक्स लगने के कारण भी मलेशिया में पाम आयल को सम्बल मिला।

जानकारों का कहना है कि मलेशिया में उत्पादन में कमी और निर्यात में वृद्धि के कारण वहां पर अक्टूबर के अंत में पाम आयल के स्टाक में कमी संभावना है।

चीन के बाजारों में भी पाम आयल और सोया आयल के भाव में तेजी रही।

थाईलैंड द्वारा दिसम्बर तक पाम आयल के निर्यात पर प्रतिबंध के कारण बाजार में मनोवैज्ञानिक असर तेजी का पड़ रहा है।

सीबोट में सोया आयल के भाव भी सप्ताह के दौरान 4.87 प्रतिशत बढ़ गए।

ब्राजील और अर्जन्टीना में सोयाबीन की बुआई में देरी होने से वहां से नई फसल की आवक में भी अब देरी की आशंका है हालांकि दोनों देशों में उत्पादन गत वर्ष से अधिक होने की आशा है।

सबसे सस्ता

जानकारों का कहना है कि हालांकि सप्ताह के दौरान सीबोट में सोया आयल के भाव में लगभग 5 प्रतिशत की तेजी आई लेकिन इसके बावजूद यह पाम आयल और सन आयल से सस्ता बना हुआ है।

किसी समय सबसे सस्ता होने वाला पाम आयल अब सबसे मंहगा हो गया है। 

उत्पादन में कमी के कारण सन आयल के भाव में भी तेजी आ रही है।

भारतीय बाजार

व्यापारियों का कहना है कि विश्व बाजार में तेजी का असर भारतीय बाजारों में तेजी का रहने का अनुमान है। हालांकि नए सोयाबीन की आवक आरंभ हो चुकी है लेकिन आयात मंहगा होने से भाव को समर्थन मिलेगा।

सरसों व इसके तेल में भी तेजी की संभावना है।

जानकारों के अनुसार देश में खाद्य तेलों की त्योहारी मांग भले ही समाप्त हो गई है लेकिन अब वैवाहिक सीजन के लिए उठाव आरंभ हो जाएगा।

 

आस्ट्रेलिया में काटन का बम्पर उत्पादन

लगभग पूरी काटन का हुआ निर्यात

नई दिल्लीजानकार व्यापारियों का कहना है कि 2023—24 के दौरान आस्ट्रेलिया में काटन का बम्पर उत्पादन हुआ था तथा कुछ देशों में आर्थिक मंदी जैसी स्थिति के बावजूद वहां से लगभग सारी काटन का निर्यात किया जा चुका है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां पर लगभग 51 लाख गांठ काटन का बम्पर उत्पादन हुआ था। इसमें से लगभग 30 प्रतिशत का निर्यात केवल चीन को ही किया गया। इसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया से वियतनाम, भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश आदि को निर्यात किया गया।

ऑस्ट्रेलियन कॉटन शिपर्स एसोसिएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जूल्स विलिस ने कहा कि एक और 50 लाख गांठ से अधिक की बम्पर काटन फसल को निर्यात करना  एक बड़ी उपलब्धि थी।

सुश्री विलिस ने ग्रेन सेंट्रल को बताया, "कपास व्यापारी हमारे अधिकांश उत्पाद ऐसे सीज़न के दौरान बेचने में कामयाब रहे हैं, जहां ऑस्ट्रेलिया के सामान्य गुणवत्ता पैरामीटर फसल के समय गीले मौसम से प्रभावित थे, जिससे फसल के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रंग और ग्रेड पर असर पड़ा।"

सुश्री विलिस ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नवंबर-मार्च की अवधि में बिना बिकी कपास की शिपिंग जारी रहेगी।

चीन प्रमुख बाज़ार

जानकारों का कहना है कि आस्ट्रेलियन कपास के एक महत्वपूर्ण खरीदार के रूप में चीन की वापसी उल्लेखनीय है, हालांकि इसकी बाजार हिस्सेदारी अब नरम प्रतिबंध अवधि से पहले 2019 की तुलना में लगभग आधी है।

आर्थिक स्थितियों के कारण चीन की नरम मांग के बावजूद, देश में ऑस्ट्रेलियाई निर्यात मजबूत बना हुआ है।

जानकारों का कहना है कि  अन्य बाजारों में ऑस्ट्रेलियाई कपास की निरंतर बढ़त चीन के नरम-प्रतिबंध अवधि के दौरान किए गए बाजार विविधीकरण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है।

व्यापारियों के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई कपास की उच्च गुणवत्ता बदलती आर्थिक स्थितियों और कपास-आधारित फैशन और घरेलू सामानों की वैश्विक खपत में कमी के बावजूद भी मांग को बढ़ा रही है।

भारतीय बाजार

सुश्री विलिस का कहना है कि  चीनी बाजार के भीतर जुड़ाव को फिर से स्थापित करने के साथ-साथ एसीएसए भारत के साथ ऑस्ट्रेलियाई सरकार की बातचीत में सहायता करने में अपनी भूमिका पर विचार कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया ने 2022 में भारत के साथ एक आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए और अब एक अधिक व्यापक समझौते - व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते, या सीईसीए पर काम कर रहा है।

वर्तमान में, ऑस्ट्रेलिया भारत में 51,000 टन कपास शुल्क मुक्त निर्यात कर सकता है, इससे अधिक के आयात पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है।

आंकड़ों के अनुसार  भारत ने 2023 में 61,000 टन से अधिक ऑस्ट्रेलियाई कपास का आयात किया, जिसमें से लगभग 10,000 टन पर 11 प्रतिशत टैरिफ लागू हुआ।

सुश्री विलिस ने कहा कि इंडोनेशिया और चीन जैसे अन्य कपास बाजारों की तुलना में ऑस्ट्रेलिया से भारत की दूरी को देखते हुए, शिपिंग लागत भी खरीदारों के लिए एक कारक थी।

उनका कहना है कि वह  एफटीए [सीईसीए] वार्ताओं में [सरकार] का समर्थन करने में भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और हम सरकार और उद्योग के साथ उन तरीकों की पहचान करने के लिए जुड़ रहे हैं जिनसे हम द्विपक्षीय संबंधों में योगदान कर सकते हैं और हमारे दो-तरफा व्यापार को चलाने में मदद कर सकते हैं।

Friday, October 25, 2024


आस्ट्रेलिया में चना टूटा
भारतीय मांग नदारद: आवक में सुधार
हमारे संवाददाता द्वारा
नई दिल्ली—जानकारों का कहना है कि आवक का दबाव बढ़ने और भारतीय आयातकों के बाजार से नदारद होने के कारण आस्ट्रेलिया में चना के भाव में भारी गिरावट आई है।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष आस्ट्रेलिया चना उत्पादन अधिक होने का अनुमान है जबकि भारत सरकार ने देश में कमी को देखते हुए 31 मार्च तक चने के आयात से ड्यूटी समाप्त कर दी है ताकि घरेलू बाजार में इसके भाव न बढ़ सकें।
व्यापारियों का कहना है अभी तक भारत के चने का लदान होने का कोई समाचार नहीं है।
भारतीय आयातकों की खरीद नहीं होने से आस्ट्रेलिया में क्विंसलैंड पहुंच चने के भाव में लगभग 250 डालर प्रति टन की गिरावट आ चुकी है।
अक्टूबर के आरंभ में क्विंसलैंड में चने का भाव लगभग 1,000 डालर प्रति टन था जो अब 710—735 डालर प्रति टन रह गया है।
जानकारों का कहना है कि विगत दिनों पाकिस्तान ने क्विंसलैंड के नए चने अवश्य कुछ खरीद की है। इनका कहना है कि अब भाव में आने पर संभव है कि भारत और बांग्लादेश की मांग आ जाए।
उत्पादन
जानकारों का कहना है कि इस वर्ष आस्ट्रेलिया में चना उत्पादन के अनुमान 15 से 17 लाख टन तक लगाए जा रहे हैं। इसे देखते हुए वहां के किसान बिकवाल बने हुए हैं। 
उल्लेखनीय है कि सितम्बर में वहां के अनेक क्षेत्रों में बारिश के बाद आस्ट्रेलिया में चने की फसल को नुकसान की बात हो रही थी तथा उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही थी।
जानकारों का कहना है कि उन्हें आशा थी कि भारत में चने की कमी और सरकार द्वारा ड्यूटी समाप्त कर देने के बाद वहां से भारी मांग आएगी लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।
आस्ट्रेलिया में किसानों रे आरंभ पाकिस्तान के लिए 1,000 डालर प्रति टन चना बोलना आरंभ किया था तथा सौदे 810—820 डालर प्रति टन सीआरएफ की दर पर हुए और अब भाव और गिर कर 720 डालर के आसपास आ गया है। जानकारों के अनुसार पाकिस्तान के आयातकों ने काफी सौदे किए हुए हैं।
जानकारों का कहना है कि वास्तव में भारतीय आयातकों की भारी मात्रा में मांग आने के अनुमान से किसान भाव बढ़ाकर बोल रहे थे।
भारत सरकार ने 2018 में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 2018 में चना आयात पर 66 प्रतिशत की दर से आयात ड्यूटी लगा दी थी।

Saturday, February 19, 2022

 

भरतपुर में 12—13 मार्च को होगा तेल उद्यमियों का महाकुम्भ
खाद्य तेल सैक्टर के हितों पर रक्षा पर होगी चर्चा
इस वर्ष देश में सरसों की रिकार्ड बुआई के बीच ​देश में रिकार्ड उत्पादन की संभावनाओं के बीच आगामी 12—13 मार्च को 42वां अ​खिल भारतीय रबी तिलहन सेमिनार भरतपुर में होने जा रहा है।
यूं तो वर्ष में हर वर्ष खाद्य तेल उद्यमियों के दो सम्मेलन होते हैं लेकिन इस वर्ष 42वां अखिल भारतीय रबी तिलहन सेमिमार ऐसे समय में हो रहा है जब विश्व बाजार में खाद्य तेलों के भाव रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं और इसका सीधा असर भारतीय खाद्य तेल बाजार पर पड़ा है। सरकार खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अनेक कदम उठा चुकी है लेकिन भाव में वांछित गिरावट नहीं आ सकी है।
वास्तव में अब खाद्य तेल उद्योगव्यापार परेशानी में है। भाव बढ़ोतरी का कारण विश्व बाजार में तेजी है लेकिन सरकार व्यापारियों को कटघरे में खड़ा कर रही है।
सरकार के बारबार आयात ड्यूटी में कमी करने या अचानक स्टाक लिमिट लगाने या आयल काम्पलैक्स में वायदा कारोबार रोकने से व्यापारी और उद्योगपति परेशानी अनुभव कर रहा है क्योंकि वह अनिश्चितता की स्थिति में कोई कारोबार की कोई योजना नहीं बना पा रहा है।
मस्टर्ड आयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन यानि मोपा के चेयरमैन श्री बाबू लाल डाटा का कहना है कि इस सेमिनार का उद्देश्य खाद्य तेल सैक्टर के हितों की रक्षा के साथ ही इस उद्योग के सामने आ रही समस्याओं के समाधान, उद्यमियों में नई त​कनीक के बारे में जागरुकता पैदा करना और देश इस सैक्टर के विकास को बढ़ावा देना है।
श्री डाटा का कहना है कि इस समय सरकारी नीतियों के कारण तिलहन उत्पादक किसान, खाद्य तेल उद्योग जिसमें प्रोसेसर्स, आयल मिलर्स भी शामिल हैं,परेशानी में है।
सेमिनार का उद्देश्य सरकार को इस बारे में अवगत कराना और सुझाव देना भी है।
उल्लेखनीय है कि भारत विश्व में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक देश है क्योंकि तिलहनों का उत्पादन खाद्य तेलों की खपत की तुलना में कम है।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशसन के प्रेजीडेंट श्री के.के. अग्रवाल का कहना है कि इस सेमिनार में देश में खाद्य तेलों के उत्पादन व उपलब्धता के बारे में भी चर्चा की जाएगी और मार्केटिंग रणनीति आदि के बारे में उद्योग को जागरुक किया जाएगा।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशन के सचिव श्री राकेश बासल का कहना है कि
सेमिनार में खाद्य तेलों की गुणवत्ता के बारे में विचारविमर्श करने के साथ ही उपभोक्ता को उच्च क्वालिटी का तेल उपलब्ध कराने पर चर्चा की जाएगी।
रबी सेमिनार कमेटी के संयोजक श्री राधेश्याम गोयल का कहना है कि इस सेमिनार में वैज्ञानिकों, तकनीकविदों तथा ते उद्योग एवं व्यापार तथा किसानों को भी आमंत्रित किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि सरसों रबी की प्रमुख तिलहन फसल है और इसमें तेल औसत मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होने के कारण देश में स्वदेशी तेलों की उपलब्धता बढ़ाने और आयात में कमी करने की क्षमता भी है।
सरसों का उत्पादन बढ़ाने की क्षमता भी व्यापक है। व्यापारियों का कहना है कि देश में सरसों का उत्पादन बढ़ाकर जल्दी ही 200 लाख टन तक किया जा सकता है लेकिन इसके लिए सरकार की अनुकूल नीतियों का होना जरुरी है।  

Friday, February 18, 2022

 मध्य प्रदेश में नई गेहूं की आवक आरंभ

सरकार द्वारा रिकार्ड उत्पादन के अनुमान

जानकार व्यापारियों का कहना है कि इस वर्ष देश में गेहूं की आवक सामान्य समय से जल्दी आरंभ हो गई और अभी नमी भी अधिक है।

जानकारों के अनुसार नई गेहूं का आरंभ फिलहाल मध्य प्रदेश की इंदौर मंडी से हुआ है और जल्दी ही मध्य भारत की अन्य मंडियों गुजरात आदि में भी आवक आरंभ हो जाएगी।

व्यापारियों के अनुसार इंदौर मंडी में लगभग 1,000 बोरी की आवक हुई है और 12-13 प्रतिशत नमी वाली गेहूं के सौदे लगभग 2,300 रुपए प्रति क्विंटल पर होते सुने गए। गत वर्ष नई गेहूं आरंभ में 2,200 रुपए बिकी थी।

व्यापारियों का कहना है कि इस समय गेहूं के भाव सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी से अधिक है। सरकार ने एमएसपी 2,015 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

नई गेहूं में नमी की मात्रा 12-13 प्रतिशत तक बताई जाती है जबकि आमतौर पर नमी 11-12 प्रतिशत होती है।

जानकारों का कहना है कि मार्च के मध्य तक इंदौर मंडी में गेहूं की आवक बढ़कर 20,000 बोरी दैनिक का स्तर पार कर सकती है।

जानकारों का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश सरकार मार्च में एमएसपी पर गेहूं की खरीद आरंभ कर देती है तो बाजार में अधिक मंदे की संभावना नजर नहीं आ रही है।

व्यापारियों के अनुसार मध्य प्रदेश के बाद जल्दी ही राजस्थान के कोटा संभाग में आवक आरंभ होने की संभावना है।

बुआई कम लेकिन

इसी बीच, देश में चालू सीजन के दौरान गेहूं की बुआई गत वर्ष की तुलना में कुछ कम हुई है क्योंकि अनेक स्थानों पर किसानों ने इसके स्थान पर सरसों की बुआई की है क्योंकि इस तिलहन फसल के भाव काफी आकर्षक रहे हैं।

सरकार ने हाल ही में जारी दूसरे अग्रिम अनुमानों में 2021-22 (जुलाई-जून) में गेहूं का उत्पादन 1,113 लाख टन होने के आशा व्यक्त की है जो एक रिकार्ड होगा।

गत वर्ष देश में 1,096 लाख टन का उत्पादन हुआ था।

बहरहाल, व्यापारियों का कहना कि उत्पादन सरकारी अनुमानों से कम हो सकता है।


Saturday, February 5, 2022

 खाद्य तेलों के बढ़ते भाव आखिर सरकार चाहती क्या है?


देश में खाद्य तेलों के बढ़ते भाव को काबू करने के लिए सरकार ने खाद्य तेलों और तिलहनों के स्टाक पर अब स्टाक सीमा आगामी 30 जून तक बढ़ा ही है।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने गत अक्टूबर में खाद्य तेलों व तिलहनों पर 31 मार्च तक स्टाक सी​मा लगाई थी और इसकी ​जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी थी।

उस समय केवल 6 राज्यों उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और बिहार ने ही इसे लागू किया था और स्टाक की सीमा भी हर राज्य ने अपनी खपत या उत्पादन को देखते हुए तय की थी।

बहरहाल, अब सरकार ने स्टाक सीमा लागू करने के काम को अपने हाथ में लिया है और एक अधिसूचना जारी करके स्टाक सीमा की मात्रा भी तय कर दी है।

बढ़ते भाव बेबस व्यापारी

उल्लेखनीय है कि भारत सहित विश्व भर में खाद्य तेलों के भाव में गत लगभग एक वर्ष से तेजी आ रही है और गत वर्ष अगस्त सितम्बर में विश्व में कई वर्ष के रिेकार्ड पर पहुंच गए थे और तेजी का प्रमुख कारण विभिन्न कारणो से अमेरिका में सोयाबीन का उत्पादन, मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम आयल का उत्पादन, कनाडा और यूरो पर कनोला—रेपसीड का उत्पादन तथा यूक्रेन आदि में सनफ्लावर सीड के उत्पादन कम होना रहा।

व्यापारी लाचार

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश में खाद्य तिलहनों—तेलों का उत्पादन इनकी खपत की तुलना में कम है और अपनी खपत के एक बड़े भाग को आयात द्वारा पूरा किया जाता है। यही नहीं भारत से सबसे अधिक विदेशी मु्द्रा कच्चे तेल के बाद खाद्य तेलों के आयात पर ही खर्च होती है।

देश में खाद्य तेलों के भाव विदेशी बाजार पर निर्भर हैं और जब वहां पर तेजी आई तो इसका असर भारतीय बाजारों पर आना भी स्वाभाविक था।

सारे तीर चलाए

सरकार ने खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अपने तरकश में रखे सारे तीर चलाए लेकिन भाव तब ही कम हुए जब विश्व बाजार में घटे।

सरकार ने पाम आयल के आयात पर दो बार ड्यूटी कम की लेकिन इसका लाभ भारतीय उपभोक्ता को नहीं मिला क्योंकि इंडोनेशिया और मलेशिया के निर्यातकों ने भाव बढ़ा दिए। पाम आयल के कुल कारोबार में दोनों देशों का पूरी तरह एकाधिकार है। इसके साथ ही वहां पर उत्पादन भी कम था।

सरकार ने सोया और सन आयल के भाव पर ड्यूटी कम कर दी लेकिन रुपया सस्ता होने और विश्वव बाजार में भाव तेज होने से इसका असर भी कोई खास नहीं हुआ। 

सरकार ने व्यापारियों पर स्टाक सीमा भी थोपी लेकिन इसका भी वांछित असर नहीं हुआ।

गिरावट आई

हां! खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आई लेकिन तब जब विश्व बाजार में गिरावट आई। ब्राजील में सोयाबीन की रिकार्ड फसल व इंडोनेशिया तथा मलेशिया में 2022 में पाम आयल में उत्पादन में सुधार के अनुमानों से भाव में गिरावट आई लेकिन यह अधिक समय तक नहीं टिक पाई क्योंकि ब्राजील ने मौसम ने धोखा दिया और वहां पर उत्पादन अब गत वर्ष से कम होने की बात कही जा रही है। इससे भाव में फिर तेजी आने लगी है।

पाम आयल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश घरेलू बाजार में पाम आयल के बढ़ते भाव से परेशान है और उसने वहां से आयात पर अंकुश लगा दिया है।

वहां से सप्लाई कम होने से मलेशिया में पाम आयल के भाव 5,700 रिंंगित के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए।

अब क्या होगा

खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आने की संभावना अब फिर दूर होती जा रही है। सरकार ने सभी उपाय कर लिए हैं। हाल के स्टाक सीमा लागू करने से भी भाव में गिरावट की संभावना सीमित ही है।

अब भाव में तब ही गिरावट आ सकती है जब​ सरकार आयात को पूरी तरह शुल्क मुक्त कर दे लेकिन यह देश के किसानों और तेल उद्योग—व्यापार के लिए घातक होगा।

अब सरसों की फसल सिर पर है। इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। ऐसे में स्टाक सीमा लागू करने से किसानों को उचित भाव नहीं मिल पांएगे तो सरकार का आत्मनिर्भर भारत का मिशन पूरा नहीं हो पाएगा।

देखना है कि अब सरकार कौन सा तीर चलाती है।

Saturday, January 29, 2022

 खाद्य तेलों में तेजी का तूफान

इंडोनेशिया से पाम आयल निर्यात सीमित

द.अमेरिका में सोया उत्पादन कम

गत कुछ दिनों से नीचे चल खाद्य तेलों के भाव इंडोनेशियाइ सरकार के एक फैसले से तेजी का तूफान ला दिया है और मलेशिया में पाम आयल के भाव लगातार तेज रहते हुए शुक्रवार को इतिहास में पहली बार 5,600 रिंगित का स्तर पार करते हुए 5,639 रिंगित प्रति टन का स्तर छू गए।

सीबोट में भी जोरदार तेजी आई।

तेजी का प्रमुख कारण इंडोनेशियाई सरकार द्वारा घरेलू बाजार में पाम आयल के बढ़ते भाव को काबू में रखने लिए इसके आयात पर अंकुश लगाना है।

इंडोनेशिया सरकार ने वहां के पाम आयल उत्पादक के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे अपने कुल उत्पादन या निर्यात की 20 प्रतिशत मात्रा घरेलू बाजार में बेचेंगे।

जानकारों का कहना है कि इससे विश्व बाजार में पाम आयल की सप्लाई कम होने की आशंका है क्योंकि इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा पाम आयल उत्पादक देश है।

इंडोनेशियासे निर्यात कम होने के कारण मलेशियाई पाम आयल की मांग बढ़ेगी और इससे शुक्रवार को वहां पाम आयल के भाव 5,639 रिंगित प्रति टन का ऐतिसाहिक स्तर छूने के बाद 5,633 रिंगित प्रति टन पर बंद हुए।

सप्ताह के दौरान पाम आयल अप्रैल वायदा में कुल 5.85 प्रतिशत की तेजी आई।

दूसरी ओर सीबोट में सोयाबीन में भारी तेजी रही। आरंभ के कारोबार में मार्च वायदा लगभग 55 सेंट प्रति बुशल तक बढ़ चुका था।

सोया आयल और सोयामील में भी तेजी रही।

सोयाबीन में तेजी का एक अन्य कारण दक्षिणी अमेरिका में सोयाबीन के उत्पादन में पूर्वानुमान की तुलना में भारी गिरावट होना है।

ब्राजील में इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन का अनुमान था लेकिन अब अनुमान लगातार कम होते जा रहे हैं।

व्यापारियों का कहना है कि अब सोयाआयल, सन आयल की मांग में सुधार होगा और आयातक देश पाम आयल की कमी को साफ्ट तेलों के आयात से पूरा करेंगे।

भारत और चीन खाद्य तेलों के प्रमुख आयातक देश हैं।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष तक सोयाबीन की तुलना मंे पाम आयल के भाव लगभग 100 डालर प्रति टन तक कम चल रहे थे जबकि सन आयल की तुलना में पाम आयल लगभग 250 डालर सस्ता होता था।

व्यापारियों का कहना है कि पाम आयल और सोया आयल के भाव लगभग समान ही हो गए हैं।


  खाद्य तेलों में तेजी का दौर सीपीओ 7.25 प्रश, सोया आयल 5 प्रश बढ़ा ब्राजील, अर्जन्टीना में सोया में  देरी गत सप्ताह विश्व बाजार में खाद्य त...