Sunday, December 27, 2020

CboT soy may soon climb to $13 per bushel

Soybean prices in Chicago Board of Trade (CboT) are likely to touch $13 per bushel mark soon due to weather concern in South America.

On Thursday, the benchmark March contract closed the session at $12.64 a bushel after hitting multi-year high of $12.75 a bushel.

Though there are expectations that there may be rains this week in some parts of Brazil and Argentine, the yield is likely to be lower than earlier estimates and overall output may fall short of projections.

Brazil has emerged as the largest soybean producer followed by the US and Argentine.

Insufficient rains have hampered the sowing operations in Argentine and there are fears that some of the projected area may remain un-sown this year.

Meantime, Crude Palm Oil price in Malaysia-the second largest producer- hit 9-year high last week on fears of sharp fall in December end-stocks in view of shrinkage in output and surging exports during December.

India’s April-Nov rice export crosses 100 lt-mark

Total rice exports from India during April-November, the first 8 months of the current fiscal crossed 100 lakh ton marks thanks to increased shipments of non-basmati rice due to competitive prices, data from APEDA shows.

During the period under review India exported total 100.72 lakh ton rice (comprising 70.25 lakh ton of non-basmati and 20.47 lakh ton of basmati rice) as against 50.77 lakh ton (comprising 31.57 lakh ton of non-basmati and 23.63 lakh ton of basmati rice).

Prices of Indian rice are competitive in the global market, said traders.

In global markets, Thailand's 5% broken rice was traded at $516-520 per ton and Vietnam's 5% broken was quoted at $500 per while Indian rice 5% broken was quoted at $381-387 per ton, said traders.

Prices of Thailand and Vietnam rice are higher due to shortage there.


Thursday, December 24, 2020

धान की खरीद गत वर्ष से 24 प्रश अधिक, Govt paddy buying up 24% until Wednesday

 धान की खरीद गत वर्ष से 24 प्रश अधिक

काटन खरीद 65.10 लाख गांठ

एक ओर जहां किसान तीन कृषि बिलों को वापिस लेने की मांग को लेकर लगभग तीन सप्ताह से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि सरकार एमएसपी पर खरीद बंद कर देगी वहीं दूसरी ओर सरकारी एजंेसियां खरीफ फसलों की जोरशोर से खरीद कर रही हैं।

सरकार का कहना है कि बुधवार तक सरकारी एजेंसियांे ने देश के विभिन्न भागों में 20 लाख टन धान की खरीद की है जो गत वर्ष की इसी अवधि की खरीद 352.70 लाख टन की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है।

पंजाब में सरकार ने सबसे अधिक-202.77 लाख टन- की खरीद की है जो कुल खरीद का 47 प्रतिशत भाग है।

सरकार पंजाब के अतिरिक्त हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, चंडीगढ़, तमिलनाडु, छत्तीस गढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिसा और अन्य धान उत्पादक राज्यों में निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर रही है।

दलहन-तिलहन

सरकारी एजेंसियां निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्यों पर खरीफ दलहन, मूंग, उड़द, अरहर के अतिरिक्त सोयाबीन और मूंगफलल आदि खरीफ तिलहनों की खरीद भी कर रही है लेकिन उन्हें अधिक माल नहीं मिल रहा है क्योंकि बाजार में भाव एमएसपी से ऊपर चल रहे हैं।

सरकार ने 51.66 लाख टन दलहनों और तिलहनों को खरीदने का इंतजाम किया हुआ है।

सरकारी एजेंसियों ने अब तक एमएसपी पर 2.24 लाख टन मूंग, उड़द, मूंगफली और सोयाबीन की खरीद की है।

इसमें लगभग 1.80 लाख टन केवल मूंगफली ही है।

मूंग, उड़द और सोयाबीन के बाजार भाव सरकार द्वारा तय एमएसपी से अधिक चल रहे हैं और किसान अपने उत्पाद व्यापारियों को बेच रहे हैं।

सरकार ने 1.23 लाख टन कोपरा खरीदने का भी फैसला किया है लेकिन अभी तक 5,089 टन कोपरा ही मिल पाया है।

काटन

सरकारी एजेंसी काटन कार्पोरेशन आफ इंडिया यानि सीसीआई ने 65 लाख टन काटन की खरीद की है।


रबी फसलों की बुआई गत वर्ष से अधिक, Rabi acreage higher than last year, despite farmer's ongoing agitation

 रबी फसलों की बुआई गत वर्ष से अधिक

गेहूं का रकबा औसत से कहीं ज्यादा


किसानों द्वारा लगभग 3 सप्ताह से तीन बिलों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहने के बावजूद देश में रबी की बुआई 4.31 प्रतिशत बढ़कर 597.92 लाख हैक्टेयर पर पहुंच गई जबकि गेहंू की बुआई औसत क्षेत्रफल से अधिक हो चुकी है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष इसी अवधि में रबी की बुआई  573.23 लाख हैक्टेयर पर हंुई थी।

इस वर्ष मोटे अनाजों को छोड़कर अन्य सभी जिंसों की बुआई गत वर्ष से आगे चल रही है।

गेहूं की बुआई 313.24 लाख हैक्टेयर पर हो चुकी है जबकि पांच वर्ष का औसत रकबा 303.28 लाख हैक्टेयर है।

गत वर्ष इसी अवधि में 297.39 लाख हैक्टेयर पर हुई थी।

दलहनों की बुआई 144.29 लाख हैक्टेयर पर हो चुकी है जबकि जो गत वर्ष की तुलना में 5.40 प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक वृद्वि चने के रकबे में हुई है जो 8 प्रतिशत बढ़कर 102.89 लाख हैक्टेयर हो गया है।

Wednesday, December 23, 2020

खाद्य तेलों में फिर तेजी का जलजला | Storm In Edible Oil

सीपीओ लगभग 9 वर्ष के रिकार्ड स्तर पर सीबोट में सोया, आयल में भी तेजी 

खाद्य तेलों के भाव में एक बार फिर तेजी आ गई क्योंकि जहां दक्षिणी अमेरिका में बारिश की कमी के कारण उत्पादन अनुमान से कम हो सकता है वहीं ब्राजील, अर्जन्टीना आदि में स्टाक की कमी है। यही नहीं पाम आयल की सप्लाई स्थिति जटिल होने के साथ ही मलेशिया में दिसम्बर में उत्पादन में कमी और निर्यात में वृद्वि के कारण सीपीओ के भाव लगभग 9 वर्ष के स्तर पर पहुंच जाने से भी तेजी को बल मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि सोमवार को खाद्य तेलों के भाव में गिरावट दर्ज की गई थी क्योंकि नए वायरस के कारण मांग प्रभावित होने की आशंका थी। 

सटोरिया का ताजा समर्थन पाकर मंगलवार को सीबोट में सोयाबीन के भाव 6 वर्ष का उच्चतम स्तर छू गए थे लेकिन बाद में आगामी सप्ताह ब्राजील, अर्जन्टीना आदि अन्य दक्षिणी अमेरिकी देशों में बारिश की संभावनाओं से भाव में कुछ गिरावट आई थी। इसी प्रकार सीबोट में सोया आयल में तेजी रही क्योंकि अर्जटीना में बंदरगाहों पर हड़ताल के कारण वहां से निर्यात नहीं हो पा रहा है। बुधवार को भी वहां पर बाजार तेज रहे। सोया आयल 40 सेंट का स्तर पार कर गया। जानकारों का कहना है कि दक्षिणी अमेरिका में बारिश के बावजूद वहां पर सोयाबीन के उत्पादन में गिरावट आना तय है क्योंकि प्रति हैक्टेयर उपज प्रभावित हो रही है। इससे फंडामेंट तेजी के ही बने हुए हैं क्योंकि स्टाक पहले ही कम है। यही स्थिति सीपीओ की है क्योंकि मलेशिया में उत्पादन कम है जबकि निर्यात बढ़ रहा है। वहां पर सीपीओ 9 वर्ष के रिकार्ड स्तर पर पहुंचने को उतावला है। वहां पर सीपीओ 124 रिंगित बढ़कर बुधवार को 8 वर्ष 8 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। 

घरेलू बाजार 
विश्व बाजार में तेजी का असर बुधवार को घरेलू बाजार में वायदा कारोबार और हाजिर में भी देखने को मिला। व्यापारियों का कहना है कि विश्व बाजार में भाव में काफी तेजी आ चुकी है और उसकी तुलना में घरेलू बाजार में कम। इससे ताजा आयात में पड़तल नहीं और इससे हाजिर में अभी और तेजी बनती है। एनसीडैक्स में सोया रिफाईंड जनवरी में 2.09 प्रतिशत की तेजी आई जबकि सोयाबीन जनवरी 2.14 प्रतिशत तथा सरसों जनवरी 1.20 प्रतिशत बढ़ गई। एमसीएक्स में सीपीओ में भी 2.04 प्रतिशत की तेजी आई। जानकारों का कहना है कि विश्व बाजार के रुख को देखते हुए तेजी का रुख अभी जारी रह सकता है।

Sunday, August 24, 2008

चाय की प्याली में तूफान

इस वर्ष जनवरी से चाय के भाव में तेजी का जो दौर आरंभ हुआ है वह अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। यही नहीं देश मं उत्पादन व खपत की स्थिति और विश्व बाजार में उत्पादन को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि भविष्य में चाय की प्याली में आया तेजी का तूफान उतर जाएगा।

इस वर्ष जनवरी से ही चाय में तेजी आरंभ हो गई थी और इसका कारण 2007 में चाय का उत्पादन 9570 लाख किलो से घट कर 9400 लाख किलो रह जाना है। इससे चालू वर्ष के आरंभ में बकाया स्टाक कम मात्रा में बचा। हालांकि इस वर्ष चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना मे आगे चल रहा है लेकिन विश्व के प्रमुख देशों में चाय का उत्पादन कम होने के कारण भाव बढ़ रहे हैं। देश से चाय के निर्यात में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून तक अखिल भारतीय स्तर पर नीलामी केंद्रों पर चाय के भाव में लगभग 10 रुपए प्रति किलो की तेजी आ चुकी है। जुलाई और अगस्त में भी तेजी का दौर बना हुआ है।
इस वर्ष देश में जनवरी से मई के दौरान चाय का उत्पादन गत वर्ष की इसी अवधि के स्तर 2264 लाख किलो से बढ़ कर 2402 लाख किलो हो गया है लेकिन देश में पुराना स्टाक कम होने के कारण इसका भाव पर कोई मंदे का असर नहीं पड़ा।
,इसी बीच, देश से निर्यात में बढ़ोतरी हो रही है। नवीनतम प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष जनवरी से जून के दौरान 874 लाख किलो चाय का निर्यात किया जा चुका है जिकि गत वर्ष इसी अवधि में 770 लाख किलो का निर्यात किया गया था। निर्यात की वर्तमान दर और विश्व बाजार की स्थिति को देखते इस वर्ष चाय का निर्यात 2000 लाख किलो से अधिक होने का अनुमान है जबकि गत वर्ष 1800 लाख किलो का निर्यात किया गया था। वर्ष 2006 में निर्यात लगभग 2190 लाख किलो का था।

जहां तक विश्व बाजार का प्रश्न है इस वर्ष उत्पादन में कमी आ रही है। केनिया में जनवरी-मई क दौरान चाय का उत्पादन 1715 लाख किलो से घट कर 1346 लाख किलो रह गया था। आगामी महीनों मं इसमें और गिरावट के समाचार हैं। तंजनिया में उत्पादन 119 लाख किलो से घट कर 107 लाख किलो रह गया था। यूगांडा, इंडोनेशिया, मलावी, जिम्बाबे आदि में भी चाय के उत्पादन में गिरावट आई है। लेकिन श्रीलंका में चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक हो चुका था। इसी प्रकार बंगलादेश में भी उत्पादन कुछ अधिक हो रहा है।

बहरहाल, कुल मिलाकर विश्व बाजार में चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में कम होगा और इसका लाभ भारतीय निर्यात को मिलेगा।

इसे देखते हुए आगामी महीनों में चाय के भाव में किसी भारी गिरावट के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

स्थिर रहेंगे गेहूं के भाव

नई दिल्ली-केंद्रीय सरकार द्वारा खुले बाजार में 50 लाख टन गेहूं की बिक्री किए जाने की घोषणा के बाद भी दिल्ली बाजार में गेहूं के भाव में कोई खास मंदा नहीं आया है। यही नहीं आने वाले महीनों में भी इस बिक्री से किसी प्रकार के मंदे की संभावना नहीं है लेकिन भाव में अब अधिक तेजी भी नही आ पाएगी।

केंद्रीय सरकार ने खुले बाजार में 50 लाख टन गेहूं बेचने की घोषणा की है। इस घोषणा के बाद भी दिल्ली सहित देश के किसी भी भाग में कोई खास मंदा नहीं आया है। दिल्ली बाजार में दड़ा क्वालिटी की गेहूं के भाव में 3 रुपए प्रति क्विंटल की गिरावट आई है और 1067/1070 रुपए प्रति क्विंटल हो गए हैं। कोटा मंडी में भी गेहूं के भाव में केवल मामूली कमी आई है।
केद्रीय सरकार द्वारा 50 लाख टन गेहूं बाजार में जारी करने के बाद भी गेहूं के भाव में अधिक मंदा नहीं आएगा लेकिन तेजी रुक जाएगी इसका कारण बाजार में गेहं की कमी होना है।
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो 2006-07 के दौरान गेहूं का उत्पादन 758.1 लाख टन हुआ था जो 2007-08 के दौरान बढ़ कर 784 लाख टन होने का अनुमान है।
सरकार द्वारा व्यापारियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर इसकी खरीद के लिए अंकुश लगाए जाने के कारण स्टाकिस्टों, व्यापारियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने विपणन वर्ष 2008-09 (अप्रैल-मार्च) के दौरान खुले बाजार में केवल सीमित खरीद ही की।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2008-09 के दौरान मंडियों मं कुल 248.28 लाख टन की आवक हुई और इसमें से सरकारी एजेंसियों ने 225.27 लाख टन की खरीद की। इस प्रकार शेष गेहूं लगभग 23 लाख टन की खरीद स्टाकिस्टों, व्यापारियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने की।
इससे पूर्व वर्ष के दौरान मंडियों में कुल आवक लगभग 151 लाख टन की हुई थी और सरकारी एजेंसियों ने 111.27 लाख टन गेहूं की खरीद की। बाकी 39 लाख टन की खरीद स्टाकिस्टों, व्यापारियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने की।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और बड़ी आटा मिलों द्वारा सरकार के पास दायर की गई रिटर्न के अनुसार इस वर्ष उन्होंने केवल 11.7 लाख टन की खरीद की जबकि गत वर्ष उन्होंने 20 लाख टन से अधिक की खरीद की थी।

वास्तव में सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य 850 रुपए से बढ़ा कर 1000 रुपए प्रति िक्वंटल किए जाने के बाद किसान भी अधिक से अधिक गेहूं बाजार में लेकर आए। यह अधिक आवक से भी स्पष्ट है क्योंकि उत्पादन तो केवल 26 लाख टन ही बढ़ा लेकिन

आवक में 97 लाख टन की बढ़ोतरी हो गई। यही नहीं सरकारी खरीद भी 114 लाख टन बढ़ गई। दूसरी ओर व्यापारियों, स्टाकिस्टों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने सकर्तता बरती।

व्यापारियों और स्टाकिस्टों ने जहां सरकारी खरीद के कारण गेहूं की खरीद से हाथ खींचे रखा वहीं पूर्व में गेहूं के भाव में अधिक बढ़ोतरी नहीं होने के कारण हुए घाटे को देखते हुए भी बाजार से पीछे हटे रहे।

बहरहाल, अब स्थिति यह है कि खुले बाजार में स्टाकिस्टों, व्यापारियों, आटा मिलों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास गेहूं का स्टाक सीमित मात्रा में है और अधिकांश स्टाक सरकारी गोदामों में है। यही कारण है कि सरकारी घोषणा के बावजूद भाव में गिरावट नहीं आई है।

समझा जाता है कि सरकार गेहूं की बिक्री समर्थन मूल्यों से अधिक भाव ही करेगी। संभव है कि सरकार आटा मिलों को टैंडर प्रणाली से गेहूूं की बिक्री करे। ऐसे में भाव किसी प्रकार की लम्बी मंदी या लम्बी तेजी की संभावना नजर नहीं आ रही है।-

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