Monday, November 4, 2024

 खाद्य तेलों में तेजी का दौर

सीपीओ 7.25 प्रश, सोया आयल 5 प्रश बढ़ा

ब्राजील, अर्जन्टीना में सोया में  देरी

गत सप्ताह विश्व बाजार में खाद्य तेलों में तेजी का दौर रहा। निर्यात अधिक होने से जहां मलेशिया में सीपीओ के भाव में लगातार दूसरे सप्ताह 7.25 प्रतिशत का उछाल आया वहीं सीबोट में सोया आयल 4.87 प्रतिशत बढ़ गया। यूक्रेन में सन आयल में भी तेेजी रही।

मलेशिया में  भाव 4,879 रिंगित का रिकार्ड स्तर छू गया जो जून 2022 के बाद सबसे ऊंचा भाव है।

जानकारों का कहना है कि मलेशिया में तेजी का कारण वहां से अक्टूबर के दौरान निर्यात में भारी वृद्धि है।

व्यापारियों के अनुसार विश्व बाजार में कच्चे तेल के भाव में वृद्वि का असर भी सीपीओ पर तेजी का पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त मलेशिया और इंडोनेशिया में  पाम आयल के उत्पादन में गिरावट की आशंका है।  इंडोनेशिया से निर्यात पर अधिक टैक्स लगने के कारण भी मलेशिया में पाम आयल को सम्बल मिला।

जानकारों का कहना है कि मलेशिया में उत्पादन में कमी और निर्यात में वृद्धि के कारण वहां पर अक्टूबर के अंत में पाम आयल के स्टाक में कमी संभावना है।

चीन के बाजारों में भी पाम आयल और सोया आयल के भाव में तेजी रही।

थाईलैंड द्वारा दिसम्बर तक पाम आयल के निर्यात पर प्रतिबंध के कारण बाजार में मनोवैज्ञानिक असर तेजी का पड़ रहा है।

सीबोट में सोया आयल के भाव भी सप्ताह के दौरान 4.87 प्रतिशत बढ़ गए।

ब्राजील और अर्जन्टीना में सोयाबीन की बुआई में देरी होने से वहां से नई फसल की आवक में भी अब देरी की आशंका है हालांकि दोनों देशों में उत्पादन गत वर्ष से अधिक होने की आशा है।

सबसे सस्ता

जानकारों का कहना है कि हालांकि सप्ताह के दौरान सीबोट में सोया आयल के भाव में लगभग 5 प्रतिशत की तेजी आई लेकिन इसके बावजूद यह पाम आयल और सन आयल से सस्ता बना हुआ है।

किसी समय सबसे सस्ता होने वाला पाम आयल अब सबसे मंहगा हो गया है। 

उत्पादन में कमी के कारण सन आयल के भाव में भी तेजी आ रही है।

भारतीय बाजार

व्यापारियों का कहना है कि विश्व बाजार में तेजी का असर भारतीय बाजारों में तेजी का रहने का अनुमान है। हालांकि नए सोयाबीन की आवक आरंभ हो चुकी है लेकिन आयात मंहगा होने से भाव को समर्थन मिलेगा।

सरसों व इसके तेल में भी तेजी की संभावना है।

जानकारों के अनुसार देश में खाद्य तेलों की त्योहारी मांग भले ही समाप्त हो गई है लेकिन अब वैवाहिक सीजन के लिए उठाव आरंभ हो जाएगा।

 

आस्ट्रेलिया में काटन का बम्पर उत्पादन

लगभग पूरी काटन का हुआ निर्यात

नई दिल्लीजानकार व्यापारियों का कहना है कि 2023—24 के दौरान आस्ट्रेलिया में काटन का बम्पर उत्पादन हुआ था तथा कुछ देशों में आर्थिक मंदी जैसी स्थिति के बावजूद वहां से लगभग सारी काटन का निर्यात किया जा चुका है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां पर लगभग 51 लाख गांठ काटन का बम्पर उत्पादन हुआ था। इसमें से लगभग 30 प्रतिशत का निर्यात केवल चीन को ही किया गया। इसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया से वियतनाम, भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश आदि को निर्यात किया गया।

ऑस्ट्रेलियन कॉटन शिपर्स एसोसिएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जूल्स विलिस ने कहा कि एक और 50 लाख गांठ से अधिक की बम्पर काटन फसल को निर्यात करना  एक बड़ी उपलब्धि थी।

सुश्री विलिस ने ग्रेन सेंट्रल को बताया, "कपास व्यापारी हमारे अधिकांश उत्पाद ऐसे सीज़न के दौरान बेचने में कामयाब रहे हैं, जहां ऑस्ट्रेलिया के सामान्य गुणवत्ता पैरामीटर फसल के समय गीले मौसम से प्रभावित थे, जिससे फसल के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रंग और ग्रेड पर असर पड़ा।"

सुश्री विलिस ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नवंबर-मार्च की अवधि में बिना बिकी कपास की शिपिंग जारी रहेगी।

चीन प्रमुख बाज़ार

जानकारों का कहना है कि आस्ट्रेलियन कपास के एक महत्वपूर्ण खरीदार के रूप में चीन की वापसी उल्लेखनीय है, हालांकि इसकी बाजार हिस्सेदारी अब नरम प्रतिबंध अवधि से पहले 2019 की तुलना में लगभग आधी है।

आर्थिक स्थितियों के कारण चीन की नरम मांग के बावजूद, देश में ऑस्ट्रेलियाई निर्यात मजबूत बना हुआ है।

जानकारों का कहना है कि  अन्य बाजारों में ऑस्ट्रेलियाई कपास की निरंतर बढ़त चीन के नरम-प्रतिबंध अवधि के दौरान किए गए बाजार विविधीकरण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है।

व्यापारियों के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई कपास की उच्च गुणवत्ता बदलती आर्थिक स्थितियों और कपास-आधारित फैशन और घरेलू सामानों की वैश्विक खपत में कमी के बावजूद भी मांग को बढ़ा रही है।

भारतीय बाजार

सुश्री विलिस का कहना है कि  चीनी बाजार के भीतर जुड़ाव को फिर से स्थापित करने के साथ-साथ एसीएसए भारत के साथ ऑस्ट्रेलियाई सरकार की बातचीत में सहायता करने में अपनी भूमिका पर विचार कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया ने 2022 में भारत के साथ एक आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए और अब एक अधिक व्यापक समझौते - व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते, या सीईसीए पर काम कर रहा है।

वर्तमान में, ऑस्ट्रेलिया भारत में 51,000 टन कपास शुल्क मुक्त निर्यात कर सकता है, इससे अधिक के आयात पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है।

आंकड़ों के अनुसार  भारत ने 2023 में 61,000 टन से अधिक ऑस्ट्रेलियाई कपास का आयात किया, जिसमें से लगभग 10,000 टन पर 11 प्रतिशत टैरिफ लागू हुआ।

सुश्री विलिस ने कहा कि इंडोनेशिया और चीन जैसे अन्य कपास बाजारों की तुलना में ऑस्ट्रेलिया से भारत की दूरी को देखते हुए, शिपिंग लागत भी खरीदारों के लिए एक कारक थी।

उनका कहना है कि वह  एफटीए [सीईसीए] वार्ताओं में [सरकार] का समर्थन करने में भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और हम सरकार और उद्योग के साथ उन तरीकों की पहचान करने के लिए जुड़ रहे हैं जिनसे हम द्विपक्षीय संबंधों में योगदान कर सकते हैं और हमारे दो-तरफा व्यापार को चलाने में मदद कर सकते हैं।

Friday, October 25, 2024


आस्ट्रेलिया में चना टूटा
भारतीय मांग नदारद: आवक में सुधार
हमारे संवाददाता द्वारा
नई दिल्ली—जानकारों का कहना है कि आवक का दबाव बढ़ने और भारतीय आयातकों के बाजार से नदारद होने के कारण आस्ट्रेलिया में चना के भाव में भारी गिरावट आई है।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष आस्ट्रेलिया चना उत्पादन अधिक होने का अनुमान है जबकि भारत सरकार ने देश में कमी को देखते हुए 31 मार्च तक चने के आयात से ड्यूटी समाप्त कर दी है ताकि घरेलू बाजार में इसके भाव न बढ़ सकें।
व्यापारियों का कहना है अभी तक भारत के चने का लदान होने का कोई समाचार नहीं है।
भारतीय आयातकों की खरीद नहीं होने से आस्ट्रेलिया में क्विंसलैंड पहुंच चने के भाव में लगभग 250 डालर प्रति टन की गिरावट आ चुकी है।
अक्टूबर के आरंभ में क्विंसलैंड में चने का भाव लगभग 1,000 डालर प्रति टन था जो अब 710—735 डालर प्रति टन रह गया है।
जानकारों का कहना है कि विगत दिनों पाकिस्तान ने क्विंसलैंड के नए चने अवश्य कुछ खरीद की है। इनका कहना है कि अब भाव में आने पर संभव है कि भारत और बांग्लादेश की मांग आ जाए।
उत्पादन
जानकारों का कहना है कि इस वर्ष आस्ट्रेलिया में चना उत्पादन के अनुमान 15 से 17 लाख टन तक लगाए जा रहे हैं। इसे देखते हुए वहां के किसान बिकवाल बने हुए हैं। 
उल्लेखनीय है कि सितम्बर में वहां के अनेक क्षेत्रों में बारिश के बाद आस्ट्रेलिया में चने की फसल को नुकसान की बात हो रही थी तथा उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही थी।
जानकारों का कहना है कि उन्हें आशा थी कि भारत में चने की कमी और सरकार द्वारा ड्यूटी समाप्त कर देने के बाद वहां से भारी मांग आएगी लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।
आस्ट्रेलिया में किसानों रे आरंभ पाकिस्तान के लिए 1,000 डालर प्रति टन चना बोलना आरंभ किया था तथा सौदे 810—820 डालर प्रति टन सीआरएफ की दर पर हुए और अब भाव और गिर कर 720 डालर के आसपास आ गया है। जानकारों के अनुसार पाकिस्तान के आयातकों ने काफी सौदे किए हुए हैं।
जानकारों का कहना है कि वास्तव में भारतीय आयातकों की भारी मात्रा में मांग आने के अनुमान से किसान भाव बढ़ाकर बोल रहे थे।
भारत सरकार ने 2018 में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 2018 में चना आयात पर 66 प्रतिशत की दर से आयात ड्यूटी लगा दी थी।

Saturday, February 19, 2022

 

भरतपुर में 12—13 मार्च को होगा तेल उद्यमियों का महाकुम्भ
खाद्य तेल सैक्टर के हितों पर रक्षा पर होगी चर्चा
इस वर्ष देश में सरसों की रिकार्ड बुआई के बीच ​देश में रिकार्ड उत्पादन की संभावनाओं के बीच आगामी 12—13 मार्च को 42वां अ​खिल भारतीय रबी तिलहन सेमिनार भरतपुर में होने जा रहा है।
यूं तो वर्ष में हर वर्ष खाद्य तेल उद्यमियों के दो सम्मेलन होते हैं लेकिन इस वर्ष 42वां अखिल भारतीय रबी तिलहन सेमिमार ऐसे समय में हो रहा है जब विश्व बाजार में खाद्य तेलों के भाव रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं और इसका सीधा असर भारतीय खाद्य तेल बाजार पर पड़ा है। सरकार खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अनेक कदम उठा चुकी है लेकिन भाव में वांछित गिरावट नहीं आ सकी है।
वास्तव में अब खाद्य तेल उद्योगव्यापार परेशानी में है। भाव बढ़ोतरी का कारण विश्व बाजार में तेजी है लेकिन सरकार व्यापारियों को कटघरे में खड़ा कर रही है।
सरकार के बारबार आयात ड्यूटी में कमी करने या अचानक स्टाक लिमिट लगाने या आयल काम्पलैक्स में वायदा कारोबार रोकने से व्यापारी और उद्योगपति परेशानी अनुभव कर रहा है क्योंकि वह अनिश्चितता की स्थिति में कोई कारोबार की कोई योजना नहीं बना पा रहा है।
मस्टर्ड आयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन यानि मोपा के चेयरमैन श्री बाबू लाल डाटा का कहना है कि इस सेमिनार का उद्देश्य खाद्य तेल सैक्टर के हितों की रक्षा के साथ ही इस उद्योग के सामने आ रही समस्याओं के समाधान, उद्यमियों में नई त​कनीक के बारे में जागरुकता पैदा करना और देश इस सैक्टर के विकास को बढ़ावा देना है।
श्री डाटा का कहना है कि इस समय सरकारी नीतियों के कारण तिलहन उत्पादक किसान, खाद्य तेल उद्योग जिसमें प्रोसेसर्स, आयल मिलर्स भी शामिल हैं,परेशानी में है।
सेमिनार का उद्देश्य सरकार को इस बारे में अवगत कराना और सुझाव देना भी है।
उल्लेखनीय है कि भारत विश्व में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक देश है क्योंकि तिलहनों का उत्पादन खाद्य तेलों की खपत की तुलना में कम है।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशसन के प्रेजीडेंट श्री के.के. अग्रवाल का कहना है कि इस सेमिनार में देश में खाद्य तेलों के उत्पादन व उपलब्धता के बारे में भी चर्चा की जाएगी और मार्केटिंग रणनीति आदि के बारे में उद्योग को जागरुक किया जाएगा।
भरतपुर आयल मिलर्स एसोसिएशन के सचिव श्री राकेश बासल का कहना है कि
सेमिनार में खाद्य तेलों की गुणवत्ता के बारे में विचारविमर्श करने के साथ ही उपभोक्ता को उच्च क्वालिटी का तेल उपलब्ध कराने पर चर्चा की जाएगी।
रबी सेमिनार कमेटी के संयोजक श्री राधेश्याम गोयल का कहना है कि इस सेमिनार में वैज्ञानिकों, तकनीकविदों तथा ते उद्योग एवं व्यापार तथा किसानों को भी आमंत्रित किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि सरसों रबी की प्रमुख तिलहन फसल है और इसमें तेल औसत मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होने के कारण देश में स्वदेशी तेलों की उपलब्धता बढ़ाने और आयात में कमी करने की क्षमता भी है।
सरसों का उत्पादन बढ़ाने की क्षमता भी व्यापक है। व्यापारियों का कहना है कि देश में सरसों का उत्पादन बढ़ाकर जल्दी ही 200 लाख टन तक किया जा सकता है लेकिन इसके लिए सरकार की अनुकूल नीतियों का होना जरुरी है।  

Friday, February 18, 2022

 मध्य प्रदेश में नई गेहूं की आवक आरंभ

सरकार द्वारा रिकार्ड उत्पादन के अनुमान

जानकार व्यापारियों का कहना है कि इस वर्ष देश में गेहूं की आवक सामान्य समय से जल्दी आरंभ हो गई और अभी नमी भी अधिक है।

जानकारों के अनुसार नई गेहूं का आरंभ फिलहाल मध्य प्रदेश की इंदौर मंडी से हुआ है और जल्दी ही मध्य भारत की अन्य मंडियों गुजरात आदि में भी आवक आरंभ हो जाएगी।

व्यापारियों के अनुसार इंदौर मंडी में लगभग 1,000 बोरी की आवक हुई है और 12-13 प्रतिशत नमी वाली गेहूं के सौदे लगभग 2,300 रुपए प्रति क्विंटल पर होते सुने गए। गत वर्ष नई गेहूं आरंभ में 2,200 रुपए बिकी थी।

व्यापारियों का कहना है कि इस समय गेहूं के भाव सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी से अधिक है। सरकार ने एमएसपी 2,015 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

नई गेहूं में नमी की मात्रा 12-13 प्रतिशत तक बताई जाती है जबकि आमतौर पर नमी 11-12 प्रतिशत होती है।

जानकारों का कहना है कि मार्च के मध्य तक इंदौर मंडी में गेहूं की आवक बढ़कर 20,000 बोरी दैनिक का स्तर पार कर सकती है।

जानकारों का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश सरकार मार्च में एमएसपी पर गेहूं की खरीद आरंभ कर देती है तो बाजार में अधिक मंदे की संभावना नजर नहीं आ रही है।

व्यापारियों के अनुसार मध्य प्रदेश के बाद जल्दी ही राजस्थान के कोटा संभाग में आवक आरंभ होने की संभावना है।

बुआई कम लेकिन

इसी बीच, देश में चालू सीजन के दौरान गेहूं की बुआई गत वर्ष की तुलना में कुछ कम हुई है क्योंकि अनेक स्थानों पर किसानों ने इसके स्थान पर सरसों की बुआई की है क्योंकि इस तिलहन फसल के भाव काफी आकर्षक रहे हैं।

सरकार ने हाल ही में जारी दूसरे अग्रिम अनुमानों में 2021-22 (जुलाई-जून) में गेहूं का उत्पादन 1,113 लाख टन होने के आशा व्यक्त की है जो एक रिकार्ड होगा।

गत वर्ष देश में 1,096 लाख टन का उत्पादन हुआ था।

बहरहाल, व्यापारियों का कहना कि उत्पादन सरकारी अनुमानों से कम हो सकता है।


Saturday, February 5, 2022

 खाद्य तेलों के बढ़ते भाव आखिर सरकार चाहती क्या है?


देश में खाद्य तेलों के बढ़ते भाव को काबू करने के लिए सरकार ने खाद्य तेलों और तिलहनों के स्टाक पर अब स्टाक सीमा आगामी 30 जून तक बढ़ा ही है।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने गत अक्टूबर में खाद्य तेलों व तिलहनों पर 31 मार्च तक स्टाक सी​मा लगाई थी और इसकी ​जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी थी।

उस समय केवल 6 राज्यों उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और बिहार ने ही इसे लागू किया था और स्टाक की सीमा भी हर राज्य ने अपनी खपत या उत्पादन को देखते हुए तय की थी।

बहरहाल, अब सरकार ने स्टाक सीमा लागू करने के काम को अपने हाथ में लिया है और एक अधिसूचना जारी करके स्टाक सीमा की मात्रा भी तय कर दी है।

बढ़ते भाव बेबस व्यापारी

उल्लेखनीय है कि भारत सहित विश्व भर में खाद्य तेलों के भाव में गत लगभग एक वर्ष से तेजी आ रही है और गत वर्ष अगस्त सितम्बर में विश्व में कई वर्ष के रिेकार्ड पर पहुंच गए थे और तेजी का प्रमुख कारण विभिन्न कारणो से अमेरिका में सोयाबीन का उत्पादन, मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम आयल का उत्पादन, कनाडा और यूरो पर कनोला—रेपसीड का उत्पादन तथा यूक्रेन आदि में सनफ्लावर सीड के उत्पादन कम होना रहा।

व्यापारी लाचार

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश में खाद्य तिलहनों—तेलों का उत्पादन इनकी खपत की तुलना में कम है और अपनी खपत के एक बड़े भाग को आयात द्वारा पूरा किया जाता है। यही नहीं भारत से सबसे अधिक विदेशी मु्द्रा कच्चे तेल के बाद खाद्य तेलों के आयात पर ही खर्च होती है।

देश में खाद्य तेलों के भाव विदेशी बाजार पर निर्भर हैं और जब वहां पर तेजी आई तो इसका असर भारतीय बाजारों पर आना भी स्वाभाविक था।

सारे तीर चलाए

सरकार ने खाद्य तेलों के भाव को बढ़ने से रोकने के लिए अपने तरकश में रखे सारे तीर चलाए लेकिन भाव तब ही कम हुए जब विश्व बाजार में घटे।

सरकार ने पाम आयल के आयात पर दो बार ड्यूटी कम की लेकिन इसका लाभ भारतीय उपभोक्ता को नहीं मिला क्योंकि इंडोनेशिया और मलेशिया के निर्यातकों ने भाव बढ़ा दिए। पाम आयल के कुल कारोबार में दोनों देशों का पूरी तरह एकाधिकार है। इसके साथ ही वहां पर उत्पादन भी कम था।

सरकार ने सोया और सन आयल के भाव पर ड्यूटी कम कर दी लेकिन रुपया सस्ता होने और विश्वव बाजार में भाव तेज होने से इसका असर भी कोई खास नहीं हुआ। 

सरकार ने व्यापारियों पर स्टाक सीमा भी थोपी लेकिन इसका भी वांछित असर नहीं हुआ।

गिरावट आई

हां! खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आई लेकिन तब जब विश्व बाजार में गिरावट आई। ब्राजील में सोयाबीन की रिकार्ड फसल व इंडोनेशिया तथा मलेशिया में 2022 में पाम आयल में उत्पादन में सुधार के अनुमानों से भाव में गिरावट आई लेकिन यह अधिक समय तक नहीं टिक पाई क्योंकि ब्राजील ने मौसम ने धोखा दिया और वहां पर उत्पादन अब गत वर्ष से कम होने की बात कही जा रही है। इससे भाव में फिर तेजी आने लगी है।

पाम आयल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश घरेलू बाजार में पाम आयल के बढ़ते भाव से परेशान है और उसने वहां से आयात पर अंकुश लगा दिया है।

वहां से सप्लाई कम होने से मलेशिया में पाम आयल के भाव 5,700 रिंंगित के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए।

अब क्या होगा

खाद्य तेलों के भाव में गिरावट आने की संभावना अब फिर दूर होती जा रही है। सरकार ने सभी उपाय कर लिए हैं। हाल के स्टाक सीमा लागू करने से भी भाव में गिरावट की संभावना सीमित ही है।

अब भाव में तब ही गिरावट आ सकती है जब​ सरकार आयात को पूरी तरह शुल्क मुक्त कर दे लेकिन यह देश के किसानों और तेल उद्योग—व्यापार के लिए घातक होगा।

अब सरसों की फसल सिर पर है। इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। ऐसे में स्टाक सीमा लागू करने से किसानों को उचित भाव नहीं मिल पांएगे तो सरकार का आत्मनिर्भर भारत का मिशन पूरा नहीं हो पाएगा।

देखना है कि अब सरकार कौन सा तीर चलाती है।

Saturday, January 29, 2022

 खाद्य तेलों में तेजी का तूफान

इंडोनेशिया से पाम आयल निर्यात सीमित

द.अमेरिका में सोया उत्पादन कम

गत कुछ दिनों से नीचे चल खाद्य तेलों के भाव इंडोनेशियाइ सरकार के एक फैसले से तेजी का तूफान ला दिया है और मलेशिया में पाम आयल के भाव लगातार तेज रहते हुए शुक्रवार को इतिहास में पहली बार 5,600 रिंगित का स्तर पार करते हुए 5,639 रिंगित प्रति टन का स्तर छू गए।

सीबोट में भी जोरदार तेजी आई।

तेजी का प्रमुख कारण इंडोनेशियाई सरकार द्वारा घरेलू बाजार में पाम आयल के बढ़ते भाव को काबू में रखने लिए इसके आयात पर अंकुश लगाना है।

इंडोनेशिया सरकार ने वहां के पाम आयल उत्पादक के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे अपने कुल उत्पादन या निर्यात की 20 प्रतिशत मात्रा घरेलू बाजार में बेचेंगे।

जानकारों का कहना है कि इससे विश्व बाजार में पाम आयल की सप्लाई कम होने की आशंका है क्योंकि इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा पाम आयल उत्पादक देश है।

इंडोनेशियासे निर्यात कम होने के कारण मलेशियाई पाम आयल की मांग बढ़ेगी और इससे शुक्रवार को वहां पाम आयल के भाव 5,639 रिंगित प्रति टन का ऐतिसाहिक स्तर छूने के बाद 5,633 रिंगित प्रति टन पर बंद हुए।

सप्ताह के दौरान पाम आयल अप्रैल वायदा में कुल 5.85 प्रतिशत की तेजी आई।

दूसरी ओर सीबोट में सोयाबीन में भारी तेजी रही। आरंभ के कारोबार में मार्च वायदा लगभग 55 सेंट प्रति बुशल तक बढ़ चुका था।

सोया आयल और सोयामील में भी तेजी रही।

सोयाबीन में तेजी का एक अन्य कारण दक्षिणी अमेरिका में सोयाबीन के उत्पादन में पूर्वानुमान की तुलना में भारी गिरावट होना है।

ब्राजील में इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन का अनुमान था लेकिन अब अनुमान लगातार कम होते जा रहे हैं।

व्यापारियों का कहना है कि अब सोयाआयल, सन आयल की मांग में सुधार होगा और आयातक देश पाम आयल की कमी को साफ्ट तेलों के आयात से पूरा करेंगे।

भारत और चीन खाद्य तेलों के प्रमुख आयातक देश हैं।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष तक सोयाबीन की तुलना मंे पाम आयल के भाव लगभग 100 डालर प्रति टन तक कम चल रहे थे जबकि सन आयल की तुलना में पाम आयल लगभग 250 डालर सस्ता होता था।

व्यापारियों का कहना है कि पाम आयल और सोया आयल के भाव लगभग समान ही हो गए हैं।


Thursday, January 20, 2022

 

महाराष्ट्र फिर चीनी उत्पादन में नम्बर एक

अनेक वर्ष के बाद महाराष्ट्र चीनी उत्पादन में एक बार फिर सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बनने जा रहा है।

उल्लेखनीय सूखे के कारण कुछ वर्षों से राज्य में गन्ने का उत्पादन कम हो रहा था और चीनी उत्पादन में इसका स्थान उत्तर प्रदेश के बाद हो गया था।

चालू सीजन में महाराष्ट्र में 192 चीनी मिलें उत्पादन कर रही हैं और कुल उत्पादन 62.08 लाख टन हो गया है।

मिलों ने कुल 625.38 लाख टन गन्ने की पेराई की है और औसत रिकवरी 9.93 प्रतिशत है।

राज्य में सबसे ज्यादा 45 चीनी मिलें सोलापुर विभाग में उत्पादन कर रही हैं और 19 जनवरी तक 148.75 लाख टन गन्ना पेराई कर 13.13 लाख टन चीनी उत्पादन हो गया है।

बहरहाल, रिकवरी अधिक होने के कारण कोल्हापुर विभाग की मिलों में 150.26 लाख टन क्रशिंग की है तथा 11.31 प्रतिशत की औस​त रिकवरी से 16.99 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।

 

पुणे विभाग में कुल 29 चीनी मिलों में पेराई हो रही है। वहां पर औसत रिकवरी 10.11 प्रतिशत है और 126.91 लाख टन गन्ने की पेराई से 12.83 लाख टन चीनी बन चुकी है।

 

Saturday, January 8, 2022

मसालों में लगेगा तेजी का तड़का/ This may be year of rise in spices

 मसालों   में लगेगा तेजी का तड़का

राजेश शर्मा

-पिछले कुछ सप्ताहों से हल्दी, जीरा, धनिया आदि में तेजी का दौर बना हुआ है तथा आगामी महीनों में इनमें और तेेजी की संभावना बनी हुई है।

लगभग 10 वर्ष के बाद हल्दी ने 10,000 रुपए का आंकड़ा पार कर लिया है। 

इसी प्रकार की स्थिति जीरा और धनिया की है।

केडिया कमोडिटी के श्री अजय केडिया का कहना है कि 2022 में कमोडिटीज का सुपर साईकिल है।

तेलों और काटन के बाद अब मसालों पर नजरें लगी हुई हैं। 

श्री केडिया का कहना है कि 2022 में तेजी के मामले में मसालों के भाव की भी वही स्थिति हो सकती है जो 2021 में खाद्य तेलों की हुई थी और काटन की हो रही है।

उल्लेखनीय है कि 2021 वर्ष खाद्य तेलों की तेजी के लिए अभूतपूर्व रहा है।


काटन में और तेजी के लिए एक बार मंदा जरुरी/Correction in cotton prices needed for fresh hike

 काटन में और तेजी के लिए एक बार मंदा जरुरी

वेबीनार में अधिकांश वक्ताओं का कथन

राजेश शर्मा

देश में काटन के भाव नित नया रिकार्ड बना रहे हैं और अब आम व्यापारी यह सोच रहा है कि क्या अब भाव और तेज जाएंगे या गिरेंगे?

उल्लेखनीय है कि देश में काटन के भाव तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुक हैं क्योंकि देश में काटन का उत्पादन कम होने की आशंका के साथ ही विश्व बाजार में भी भाव 10 वर्ष की चोटी पर बने हुए हैं।

मंदा जरुरी

शनिवार को केडिया एडवाईजरी, आईएसीओएसएआईए और एमसीएक्स द्वारा आयोजित काटन काम्पलैक्स पर आयोजित एक वेबीनार में अधिकांश वक्ताओं का यह मानना था कि काटन के भाव में और तेजी की संभावना है लेकिन इसके लिए भाव में एक बार मंदा आना जरुरी है।

लगभग सभी वक्ताओं का कहना था कि तेजी का कारण विश्व बाजार के साथ ही देश में काटन का उत्पादन कम होना है जबकि काटन यार्न की मांग में बढ़ोतरी हो रही है।

वक्ताओं का कहना था कि यह कहना गलत है कि सट्टेबाजी के कारण भाव बढ़ रहे हैं बल्कि तेजी का कारण मांग और सप्लाई है।

केडिया एडवाइजरी के श्री अजय केडिया के अनुसार वास्तव में देश से गारमेंट का निर्यात बढ़ रहा है और काटन यार्न की कपड़ा मिलों की मांग लगातार बनी हुई है। 

श्री केडिया के अनुसार टैक्नीकली अभी पूरे काटन काम्पलैक्स यानि कपास, काटन, तेल और खल में हाजिर और वायदा में तेजी लग रही है।

उनका कहना था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाव काफी तेज हो चुके हैं लेकिन अभी और तेजी की संभावना है क्योंकि विश्व बाजार तेज है और उत्पादन भी कम है लेकिन इसके लिए एक बार मंदा आना जरुरी है। यह मंदा कब और कितना आएगा यह समय बताएगा।

आईएसीओएसएआईए के संयोजक श्री सुधीर अग्रवाल के अनुसार उनके सर्वे के अनुसार काटन का उत्पादन कम है और भाव में तेजी आ चुकी है। 

आगामी कुछ महीने भाव के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। व्यापारियों का व्यापार सतर्कतापूर्वक करना चाहिए।

काटन एसोसिएशन आफ इंडिया के प्रेजीडेंट श्री अतुल गनात्रा का कहना था कि एसोसिएशन 2021-22 सीजन के अनुमान 15 जनवरी को लगाएगी और तब ही फसल के बारे में कुछ कहा जा सकेगा।

आईएसीओएसएआईए एक सदस्य का कहना था कि बाजार में तेजी लग रही है और ऐसे में माल बेचकर चलने में जोखिम लग रहा है।

एक अन्य सदस्य श्री राजेश चौधरी का कहना था कि पहले देश में काटन का अनुमान 337 लाख गांठ का था लेकिन अब हालात देख कर लगता है कि यह 278 लाख गांठ पर ही सिमट जाएगा।

आस्ट्रोगुरु कर्नल अजय अग्रवाल का कहना था कि इस वर्ष बढ़िया काटन के उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है और यही कारण है कि भाव में तेजी आ रही है।

आमतौर पर ए ग्रेड की काटन का उत्पादन कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत तक होता है लेकिन इस वर्ष इसकी मात्रा केवल 20 प्रतिशत ही होने की संभावना है।

हल्की क्वालिटी की काटन उपलब्धता अधिक है।

उनका भी मानना था कि यदि सरकारी हस्तपेक्ष नहीं होता है तो भाव में तेजी की संभावना है लेकिन इसके लिए एक बार मंदा आना जरुरी है।

Wednesday, January 6, 2021

सीबोट में सोया चला अब 14 डालर की ओर/CBoT soy may top $14-mark due to uncertainty over supplies from south America

 

सीबोट में सोया चला अब 14 डालर की ओर

 सीबोट  में सोयाबीन के भाव में लगातार तेजी बनी हुई है और अब ऐसा लगता है कि 14 डालर प्रति बुशल का स्तर छूने की ओर बढ़ रहा है।

उल्लेखनीय है कि गत कुछ महीनों से सीबोट में सोयाबीन के भाव में लगातार तेजी आ रही है और कुछ महीने पहले 9 डालर के नीचे था लेकिन विगत दिनों यह 13 डालर का स्तर पार कर चुका है।

सोयाबीन में तेजी का प्रमुख कारण इस वर्ष विश्व में सोयाबीन की कमी होने के साथ ही पाम आयल की कमी और इसके भाव में आ रही तेजी है।

सोयाबीन और पाम आयल दोनों ही तेजी का अनेक वर्षो का रिकार्ड तोड़ चुके हैं।

जहां तक सोयाबीन का प्रश्न है इसमें तेजी का प्रमुख कारण दक्षिणी अमेरिका में शुष्क व गर्म मौसम है।

व्यापारियों का कहना है कि ला-नीना के कारण दक्षिणी अमेरिका में बारिश की कमी के साथ ही मौसम भी गर्म रहा जिससे ब्राजील और अर्जन्टीना में सोयाबीन की बुआई प्रभावित हुई।

बुआई में देरी और भूमि में नमी के कारण वहां पर प्रति हैक्टेयर उपज भी प्रभावित होने की आशंका हैै।

अभी तक विश्व में अमेरिका सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश था लेकिन अब इसका स्थान ब्राजील ने ले लिया है तथा अमेरिका दूसरे नम्बर पर आ गया है और अर्जन्टीना तीसरे स्थान पर ही है।

विश्व में कुल सोयाबीन उत्पादन में इन तीनों देशों का योगदान लगभग 81 प्रतिशत है।

अमेरिका में पहले ही उत्पादन कम हुआ है और बाकी दो प्रमुख देशों में भी उत्पादन के बारे में अनिश्चितता की स्थिति है।

इसके अतिरिक्त विश्व में इस समय सोयाबीन की भारी कमी बनी हुई है जबकि ब्राजील मंे सोयाबीन की फसल में देेरी की आशंका है।

हालांकि वहां के माटो ग्रासो प्रान्त में सोयाबीन की कटाई आरंभ हो चुकी है लेकिन गत वर्ष से काफी पीछे हैं।

जानकारों का कहना है कि ब्राजील और अर्जन्टीना में नई फसल का दबाव फरवरी में जाकर बनेगा जो तेजी का कारण बन रहा है।

इसके अतिरिक्त इंडोेनेशिया और मलेशिया में पाम आयल के उत्पादन में कमी के साथ मलेशिया में सीपीओ के नित बढ़ते भाव से सोयाबीन को सम्बल मिल रहा है क्योंकि सोया आयल की मांग बढ़ रही है।

जानकारों का कहना है कि आगामी दिनों जारी होने वाले अमेरिकी कृषि विभाग के सोयाबीन के उत्पादन, सप्लाई और स्टाक के आंकड़े भी सोयाबीन के भाव की दिशा तय करेंगे।

व्यापारियों को आशंका है कि ब्राजील तथा अर्जन्टीना में उत्पादन आंकड़ों में कमी की जा सकती है।

Tuesday, January 5, 2021

काटन में तेजी की संभावना, Spot cotton seen bullish on good demand

 काटन में तेजी की संभावना

सीसीआई की काटन की  अच्छी मांग
विश्व बाजार और घरेलू बाजार की स्थिति को देखते हुए हाजिर में काटन के भाव में अभी तेजी की संभावना बनी हुई है और जानकारों का कहना है कि शंकर-6 के भाव 45,000 रुपए प्रति खंडी (प्रति खंडी 356 किलो) के करीब पहुंच सकते हैं।
जहां एक ओर काटन कार्पोरेशन आफ इंडिया (सीसीआई) काटन की खरीद कर रही है वहीं बिक्री भी कर रही है।
देश में काटन की आवक में भी कमी आ रही है तथा कुल फसल का एक बड़ा भाग मंडियों आ चुका है।
काटन एसोसिएशन आफ इंडिया के अनुसार इस वर्ष यानि 2020-21 (अक्टूबर-सितम्बर) में काटन का उत्पादन 356 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) होने का अनुमान है जबकि गत वर्ष 360 लाख गांठ था।
जानकारों का कहना है कि हालांकि इस वर्ष बुआई अधिक हुई है लेकिन वास्तव में उत्पादन इससे भी कम हो सकता है क्योंकि तेलंगाना और महाराष्ट्र आदि में उत्पादन कम होने की आशंका है। अन्य राज्यों भी उत्पादन कम हो सकता है।
सीएआई के अनुसार 31 दिसम्बर तक देश की मंडियों में 170.36 लाख गांठ यानि लगभग 48 प्रतिशत की आवक हो चुकी है।
इसमें से भी सरकारी एजेंसियों ने लगभग 78 लाख गांठों की खरीद की है।
इस प्रकार आगामी दिनों में काटन की आवक कम होती रहेगी और अब अधिकांश काटन सरकारी हाथों में चली गई है।
सीसीआई की सेल
इस समय सीसीआई काटन की बिक्री कर रही है और गत लगभग 10 दिनों में काटन के भाव में 500 रुपए प्रति खंडी की  वृद्वि कर चुकी है।
भाव वृद्वि के बावजूद लगभग एक सप्ताह में उसने लगभग 9 लाख गांठों की बिक्री की है।
जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं लगता कि वह भाव में कमी करेगी।
विश्व बाजार
इसी बीच, विश्व बाजार में काटन के भाव में तेजी बनी हुई है और मंगलवार को न्यूयार्क में काटन वायदा लगभग दो माह के उच्चतम स्तर यानि 80 सेंट प्रति पौंड के करीब पहुंच गया था।
जानकारों का कहना है कि विश्व में काटन का उत्पादन कम होने की आशंका से भाव वृद्वि हो रही है।

Monday, January 4, 2021

India may export 60 lakh ton sugar this season: ISMA

 

 

 

India may export 60 lakh ton sugar this season: ISMA

India may export 60 lakh ton sugar during the current sugar season 2020-21 (October-September) due to lower output in Thailand despite lower incentive for exports, says Indian Sugar Mills Association (ISMA).

Meantime, India’s Oct-Dec sugar output jumped 42% on year to 110.72 lakh tons.

So far, mills have signed contract to export around 10 lakh tons of sweetener and sugar have started moving for exports.

Though the actual expenses incurred on internal transport, ocean freight and marketing and promotion charges are much higher, the government had restricted the export subsidy for the sugar exports at Rs.6000 per ton considering that the world sugar prices were better in December 2020 as compared to what it was in September 2019.

 “Considering that the world wants Indian sugar, and the fact that sugar production is lower in Thailand, EU etc., India should be able to export its targeted volumes with the support of the Rs.6000 per ton of export subsidy during 2020-21,” said ISMA in a press release.

Sugar production in the second largest sugar exporting nation i.e. Thailand, is almost 80-90 lakh ton less than what they usually produce.

“Therefore, India has an opportunity to export its sugar to the Asian importing countries, especially Indonesia and Malaysia, in addition to its own traditional markets in Middle East, Sri Lanka, Bangladesh, and East Africa etc.” ISMA added.

India has a good opportunity to contract and export sugar till about March-April 2021, by when Brazilian sugar comes into the market.

 With Brazilian sugar production estimated to be over a record high of 380 lakh ton from April 2021, the net ex-mill sugar prices for Indian millers will not remain as good in future for their sugar exports.

OUTPUT UP 42%

Meantime, Indian mills during the first three months of the current season have produced 110.22 lakh tons of sugar, as compared to 77.63 lakh tons produced last year in the same period thanks of sharp jump in production in Maharashtra-the second largest producing state.

 In Maharashtra, 179 sugar mills, which are in operation, have produced 39.86 lakh tons till 31st December, 2020, as against 135 sugar mills which had produced 16.50lac tons last year upto same period.

 In Uttar Pradesh –the largest producer-sugar output stood at 33.66 lakh tons as against 33.16 lakh tons a year ago.

Sugar output in Karnataka-the third largest producer-sugar output went up to 24.16 lakh tons from 6.33 lakh tons last year.

Tuesday, December 29, 2020

सीएआइ द्वारा काटन निर्यात पर प्रोत्साहन का सुझाव/CAI suggests incentive to boost cotton extports

 काटन निर्यात पर प्रोत्साहन का सुझाव

कम होगा सराकरी खजाने पर बोझ-अतुल गनात्रा

काटन एसोसिएशन आफ इंडिया यानि सीएआइ के अध्यक्ष श्री अतुल गनात्रा ने सरकार को सुझाव दिया कि काटन निर्यात को प्रोत्साहन देकर सरकारी खरीद और इससे खजाने पर पड़ने बोझ को कम किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष सरकारी एजेंसियों ने लगभग 115 लाख गांठ काटन की खरीद की जो एक रिकाड है।

इस वर्ष भी सरकार को अधिक खरीद करनी पड़ सकती है क्योंकि अभी तक लगभग 70 लाख गांठ की खरीद की जा चुकी है।

काटन एसोसिएशन आफ इंडिया की अठ्ठावनवीं वार्षिक आम सभा में बोलते हुए श्री गनात्रा ने कहा कि भाव में भारी गिरावट आने पर सरकार द्वारा किसानों को बिकवाली से रोकने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर काटन की खरीद आवश्यक है लेकिन निर्यात पर प्रोत्साहन देकर खजाने पर पड़ने वाले बोझ को कम किया जा सकता है। 

उन्होंने कहा कि इससे भारतीय काटन उत्पादकों को भी अन्य देशों जैसे अमेरिका, आस्टेªलिया, ब्राजील आदि के किसानों की भांति प्रतिस्पर्धक दाम मिल सकेंगे।

श्री गनात्रा का कहना है कि इस समय विश्व बाजार में भारतीय काटन सबसे सस्ती है और यहां से निर्यात में बढ़ोतरी की व्यापक संभावनाएं हैं।

श्री गनात्रा का कहना है कि इस समय भारत विश्व में काटन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यहां पर काटन का रकबा विश्व में सबसे अधिक है लेकिन प्रति हैक्टेयर उपज कम होना चिंता का विषय है।

भारत में काटन की प्रति हैक्टेयर उपज 500 किलो के आसपास है जबकि विश्व में औसत उपज 700 किलो है।

उन्होंने कहा कि हालांकि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से प्रति हैक्टेयर उपज में बढ़ोतरी हुई है लेकिन इस दिशा में अभी और किये जाने की आवश्यकता है।

कोविड का कुप्रभाव

श्री गनात्रा ने कहा कि कोविड-19 ने देश के टैक्सटाईल सैक्टर को ्रबुरी तरह प्रभावित किया है।

कोविड-19 संकट से पूर्व आशा थी कि इस सैक्टर में सुधार की गति जारी रहेगी लेकिन इस महामारी ने टैक्सटाईल के प्रत्येक सैक्टर को अस्त-व्यस्त कर दिया था तथा पूरी श्रृंखला को प्रभावित किया।

हालांकि काटन वर्ष 2029-20 (अक्टूबर-सितम्बर) के दौरान देश में काटन का उत्पादन पूर्व वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत बढ़कर 360 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) हो गया लेकिन कोविड-19 के कारण खपत में भारी कमी आई।

श्री गनात्रा के अनुसार हाल ही में समाप्त हुए काटन वर्ष यानि 2029-20 में काटन की खपत पूर्व वर्ष की तुलना में 19.75 प्रतिशत घट कर 250 लाख गांठ रह गई।

इससे पूर्व वर्ष में खपत 311.50 लाख गांठ थी।

भारत से काटन का निर्यात भी प्रभावित हुआ और केवल 50 लाख गांठ काटन का निर्यात ही किया जा सका जबकि अनुमान इससे कहीं अधिक का था।

विश्व बाजार

श्री गनात्रा का कहना है इंटरनैशनल काटन एडवाईजरी कमेटी यारि आइसीएसी के अनुसार 2019-20 में विश्व में काटन उत्पादन 260.5 लाख टन रहा जबकि खपत 225.4 लाख टन रही।

इससे 2019-20 सीजन के अंत में काटन का बकाया स्टाक 212.4 लाख टन रहा जो इस चालू वर्ष के अंत मंे बढ़कर उ216.5 लाख टन हो सकता है।


Sunday, December 27, 2020

CboT soy may soon climb to $13 per bushel

Soybean prices in Chicago Board of Trade (CboT) are likely to touch $13 per bushel mark soon due to weather concern in South America.

On Thursday, the benchmark March contract closed the session at $12.64 a bushel after hitting multi-year high of $12.75 a bushel.

Though there are expectations that there may be rains this week in some parts of Brazil and Argentine, the yield is likely to be lower than earlier estimates and overall output may fall short of projections.

Brazil has emerged as the largest soybean producer followed by the US and Argentine.

Insufficient rains have hampered the sowing operations in Argentine and there are fears that some of the projected area may remain un-sown this year.

Meantime, Crude Palm Oil price in Malaysia-the second largest producer- hit 9-year high last week on fears of sharp fall in December end-stocks in view of shrinkage in output and surging exports during December.

India’s April-Nov rice export crosses 100 lt-mark

Total rice exports from India during April-November, the first 8 months of the current fiscal crossed 100 lakh ton marks thanks to increased shipments of non-basmati rice due to competitive prices, data from APEDA shows.

During the period under review India exported total 100.72 lakh ton rice (comprising 70.25 lakh ton of non-basmati and 20.47 lakh ton of basmati rice) as against 50.77 lakh ton (comprising 31.57 lakh ton of non-basmati and 23.63 lakh ton of basmati rice).

Prices of Indian rice are competitive in the global market, said traders.

In global markets, Thailand's 5% broken rice was traded at $516-520 per ton and Vietnam's 5% broken was quoted at $500 per while Indian rice 5% broken was quoted at $381-387 per ton, said traders.

Prices of Thailand and Vietnam rice are higher due to shortage there.


Thursday, December 24, 2020

धान की खरीद गत वर्ष से 24 प्रश अधिक, Govt paddy buying up 24% until Wednesday

 धान की खरीद गत वर्ष से 24 प्रश अधिक

काटन खरीद 65.10 लाख गांठ

एक ओर जहां किसान तीन कृषि बिलों को वापिस लेने की मांग को लेकर लगभग तीन सप्ताह से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि सरकार एमएसपी पर खरीद बंद कर देगी वहीं दूसरी ओर सरकारी एजंेसियां खरीफ फसलों की जोरशोर से खरीद कर रही हैं।

सरकार का कहना है कि बुधवार तक सरकारी एजेंसियांे ने देश के विभिन्न भागों में 20 लाख टन धान की खरीद की है जो गत वर्ष की इसी अवधि की खरीद 352.70 लाख टन की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है।

पंजाब में सरकार ने सबसे अधिक-202.77 लाख टन- की खरीद की है जो कुल खरीद का 47 प्रतिशत भाग है।

सरकार पंजाब के अतिरिक्त हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, चंडीगढ़, तमिलनाडु, छत्तीस गढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिसा और अन्य धान उत्पादक राज्यों में निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर रही है।

दलहन-तिलहन

सरकारी एजेंसियां निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्यों पर खरीफ दलहन, मूंग, उड़द, अरहर के अतिरिक्त सोयाबीन और मूंगफलल आदि खरीफ तिलहनों की खरीद भी कर रही है लेकिन उन्हें अधिक माल नहीं मिल रहा है क्योंकि बाजार में भाव एमएसपी से ऊपर चल रहे हैं।

सरकार ने 51.66 लाख टन दलहनों और तिलहनों को खरीदने का इंतजाम किया हुआ है।

सरकारी एजेंसियों ने अब तक एमएसपी पर 2.24 लाख टन मूंग, उड़द, मूंगफली और सोयाबीन की खरीद की है।

इसमें लगभग 1.80 लाख टन केवल मूंगफली ही है।

मूंग, उड़द और सोयाबीन के बाजार भाव सरकार द्वारा तय एमएसपी से अधिक चल रहे हैं और किसान अपने उत्पाद व्यापारियों को बेच रहे हैं।

सरकार ने 1.23 लाख टन कोपरा खरीदने का भी फैसला किया है लेकिन अभी तक 5,089 टन कोपरा ही मिल पाया है।

काटन

सरकारी एजेंसी काटन कार्पोरेशन आफ इंडिया यानि सीसीआई ने 65 लाख टन काटन की खरीद की है।


रबी फसलों की बुआई गत वर्ष से अधिक, Rabi acreage higher than last year, despite farmer's ongoing agitation

 रबी फसलों की बुआई गत वर्ष से अधिक

गेहूं का रकबा औसत से कहीं ज्यादा


किसानों द्वारा लगभग 3 सप्ताह से तीन बिलों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहने के बावजूद देश में रबी की बुआई 4.31 प्रतिशत बढ़कर 597.92 लाख हैक्टेयर पर पहुंच गई जबकि गेहंू की बुआई औसत क्षेत्रफल से अधिक हो चुकी है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष इसी अवधि में रबी की बुआई  573.23 लाख हैक्टेयर पर हंुई थी।

इस वर्ष मोटे अनाजों को छोड़कर अन्य सभी जिंसों की बुआई गत वर्ष से आगे चल रही है।

गेहूं की बुआई 313.24 लाख हैक्टेयर पर हो चुकी है जबकि पांच वर्ष का औसत रकबा 303.28 लाख हैक्टेयर है।

गत वर्ष इसी अवधि में 297.39 लाख हैक्टेयर पर हुई थी।

दलहनों की बुआई 144.29 लाख हैक्टेयर पर हो चुकी है जबकि जो गत वर्ष की तुलना में 5.40 प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक वृद्वि चने के रकबे में हुई है जो 8 प्रतिशत बढ़कर 102.89 लाख हैक्टेयर हो गया है।

Wednesday, December 23, 2020

खाद्य तेलों में फिर तेजी का जलजला | Storm In Edible Oil

सीपीओ लगभग 9 वर्ष के रिकार्ड स्तर पर सीबोट में सोया, आयल में भी तेजी 

खाद्य तेलों के भाव में एक बार फिर तेजी आ गई क्योंकि जहां दक्षिणी अमेरिका में बारिश की कमी के कारण उत्पादन अनुमान से कम हो सकता है वहीं ब्राजील, अर्जन्टीना आदि में स्टाक की कमी है। यही नहीं पाम आयल की सप्लाई स्थिति जटिल होने के साथ ही मलेशिया में दिसम्बर में उत्पादन में कमी और निर्यात में वृद्वि के कारण सीपीओ के भाव लगभग 9 वर्ष के स्तर पर पहुंच जाने से भी तेजी को बल मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि सोमवार को खाद्य तेलों के भाव में गिरावट दर्ज की गई थी क्योंकि नए वायरस के कारण मांग प्रभावित होने की आशंका थी। 

सटोरिया का ताजा समर्थन पाकर मंगलवार को सीबोट में सोयाबीन के भाव 6 वर्ष का उच्चतम स्तर छू गए थे लेकिन बाद में आगामी सप्ताह ब्राजील, अर्जन्टीना आदि अन्य दक्षिणी अमेरिकी देशों में बारिश की संभावनाओं से भाव में कुछ गिरावट आई थी। इसी प्रकार सीबोट में सोया आयल में तेजी रही क्योंकि अर्जटीना में बंदरगाहों पर हड़ताल के कारण वहां से निर्यात नहीं हो पा रहा है। बुधवार को भी वहां पर बाजार तेज रहे। सोया आयल 40 सेंट का स्तर पार कर गया। जानकारों का कहना है कि दक्षिणी अमेरिका में बारिश के बावजूद वहां पर सोयाबीन के उत्पादन में गिरावट आना तय है क्योंकि प्रति हैक्टेयर उपज प्रभावित हो रही है। इससे फंडामेंट तेजी के ही बने हुए हैं क्योंकि स्टाक पहले ही कम है। यही स्थिति सीपीओ की है क्योंकि मलेशिया में उत्पादन कम है जबकि निर्यात बढ़ रहा है। वहां पर सीपीओ 9 वर्ष के रिकार्ड स्तर पर पहुंचने को उतावला है। वहां पर सीपीओ 124 रिंगित बढ़कर बुधवार को 8 वर्ष 8 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। 

घरेलू बाजार 
विश्व बाजार में तेजी का असर बुधवार को घरेलू बाजार में वायदा कारोबार और हाजिर में भी देखने को मिला। व्यापारियों का कहना है कि विश्व बाजार में भाव में काफी तेजी आ चुकी है और उसकी तुलना में घरेलू बाजार में कम। इससे ताजा आयात में पड़तल नहीं और इससे हाजिर में अभी और तेजी बनती है। एनसीडैक्स में सोया रिफाईंड जनवरी में 2.09 प्रतिशत की तेजी आई जबकि सोयाबीन जनवरी 2.14 प्रतिशत तथा सरसों जनवरी 1.20 प्रतिशत बढ़ गई। एमसीएक्स में सीपीओ में भी 2.04 प्रतिशत की तेजी आई। जानकारों का कहना है कि विश्व बाजार के रुख को देखते हुए तेजी का रुख अभी जारी रह सकता है।

Sunday, August 24, 2008

चाय की प्याली में तूफान

इस वर्ष जनवरी से चाय के भाव में तेजी का जो दौर आरंभ हुआ है वह अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। यही नहीं देश मं उत्पादन व खपत की स्थिति और विश्व बाजार में उत्पादन को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि भविष्य में चाय की प्याली में आया तेजी का तूफान उतर जाएगा।

इस वर्ष जनवरी से ही चाय में तेजी आरंभ हो गई थी और इसका कारण 2007 में चाय का उत्पादन 9570 लाख किलो से घट कर 9400 लाख किलो रह जाना है। इससे चालू वर्ष के आरंभ में बकाया स्टाक कम मात्रा में बचा। हालांकि इस वर्ष चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना मे आगे चल रहा है लेकिन विश्व के प्रमुख देशों में चाय का उत्पादन कम होने के कारण भाव बढ़ रहे हैं। देश से चाय के निर्यात में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून तक अखिल भारतीय स्तर पर नीलामी केंद्रों पर चाय के भाव में लगभग 10 रुपए प्रति किलो की तेजी आ चुकी है। जुलाई और अगस्त में भी तेजी का दौर बना हुआ है।
इस वर्ष देश में जनवरी से मई के दौरान चाय का उत्पादन गत वर्ष की इसी अवधि के स्तर 2264 लाख किलो से बढ़ कर 2402 लाख किलो हो गया है लेकिन देश में पुराना स्टाक कम होने के कारण इसका भाव पर कोई मंदे का असर नहीं पड़ा।
,इसी बीच, देश से निर्यात में बढ़ोतरी हो रही है। नवीनतम प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष जनवरी से जून के दौरान 874 लाख किलो चाय का निर्यात किया जा चुका है जिकि गत वर्ष इसी अवधि में 770 लाख किलो का निर्यात किया गया था। निर्यात की वर्तमान दर और विश्व बाजार की स्थिति को देखते इस वर्ष चाय का निर्यात 2000 लाख किलो से अधिक होने का अनुमान है जबकि गत वर्ष 1800 लाख किलो का निर्यात किया गया था। वर्ष 2006 में निर्यात लगभग 2190 लाख किलो का था।

जहां तक विश्व बाजार का प्रश्न है इस वर्ष उत्पादन में कमी आ रही है। केनिया में जनवरी-मई क दौरान चाय का उत्पादन 1715 लाख किलो से घट कर 1346 लाख किलो रह गया था। आगामी महीनों मं इसमें और गिरावट के समाचार हैं। तंजनिया में उत्पादन 119 लाख किलो से घट कर 107 लाख किलो रह गया था। यूगांडा, इंडोनेशिया, मलावी, जिम्बाबे आदि में भी चाय के उत्पादन में गिरावट आई है। लेकिन श्रीलंका में चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक हो चुका था। इसी प्रकार बंगलादेश में भी उत्पादन कुछ अधिक हो रहा है।

बहरहाल, कुल मिलाकर विश्व बाजार में चाय का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में कम होगा और इसका लाभ भारतीय निर्यात को मिलेगा।

इसे देखते हुए आगामी महीनों में चाय के भाव में किसी भारी गिरावट के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

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